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1191 में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया, तराइन के मैदान में पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध में गौरी बुरी तरह पराजित हुआ, 1192 में गौरी ने दुबारा आक्रमण में पृथ्वीराज को हरा दिया, कुतुबुद्दीन, गौरी का सेनापति था. 1206 में गौरी ने कुतुबुद्दीन को अपना नायब नियुक्त किया और जब 1206 में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हुई वहगद्दी पर बैठा।

अनेक विरोधियों को समाप्त करने में उसे लाहौर में ही दो वर्ष लग गए I 1210 लाहौर में पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर उसकी मौत हो गयी। अब इतिहास के पन्नों में लिख दिया गया है कि कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार, कुवैतुल इस्लाम मस्जिद औरअजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिदभी बनवाई I

अब कुछ प्रश्न ……. अब कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई, लेकिन कब ? क्या कुतुबुद्दीन ने अपने राज्य काल 1206 से 1210 मीनार का निर्माण करा सकता था ? जबकि पहले केदो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये और 1210 में भी मरने के पहले भी वह लाहौर में
था ?……शायद नहीं I

कुछ ने लिखा कि इसे 1193 में बनाना शुरू किया। यह भी कि कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं। उसके ऊपर तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और उसके ऊपर कि शेष मंजिलें बाद में बनी I यदि 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरूकिया होता तो उसका नाम बादशाह गौरी के नामपर “गौरी मीनार “या ऐसा ही कुछ होता न कि सेनापति कुतुबुद्दीन के नाम पर क़ुतुब मीनार I

उसने लिखवाया कि उस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई,अब क्या किसी भवन के मलबे से कोई क़ुतुब मीनारजैसा उत्कृष्ट कलापूर्ण भवन बनाया जा सकता है|
जिसका हर पत्थर स्थानानुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है? कुछ लोगो ने लिखा कि नमाज़ समय अजान देने के लिए यह मीनार बनी पर क्या उतनी ऊंचाई से किसी की आवाज़ निचे तक आ भी सकती है? उपरोक्त सभी बातें झूठ का पुलिंदा लगती है। इनमें कुछ भी तर्क की कसौटी पर सच्चा नहीं सच तो यह है की जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है वहमेहरौली कहा जाता है, मेहरौली वराहमिहिर के नामपर बसाया गया था। जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक, और खगोलशास्त्री थे।

*वराहमिहिर ने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ को तरों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए २७ कलापूर्ण
परिपथों का निर्माण करवाया था I इन परिपथों केस्तंभों पर सूक्ष्म कारीगरी के साथ देवी देवताओं
की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जानेके बाद भी कहीं कहीं दिख जाती हैं I कुछ संस्कृत
भाषा के अंश दीवारों और बीथिकाओं के स्तंभों पर उकेरे हुए मिल जायेंगे जो मिटाए गए होने के बावजूद पढ़ेजा सकते हैं I मीनार , चारों ओर के निर्माणका ही भाग लगता है, अलग से बनवाया हुआ नहीं लगता, इसमे मूल रूप में सात मंजिलें थीं सातवीं मंजिल पर ” ब्रम्हा जी की हाथ में वेद लिए हुए “मूर्ति थी जो तोड़ डाली गयीं थी,छठी मंजिल पर विष्णुजी की मूर्ति के साथ कुछ निर्माण थे वे भी हटा दिए गए होंगे, अब केवल पाँच मंजिलें ही शेष है इसका नाम विष्णु ध्वज /विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ प्रचलन में थे।

इन सब का सबसे बड़ा प्रमाण उसी परिसर में खड़ा लौहस्तम्भ है जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेखजिसे झुठलाया नहीं जा सकता ,लिखा है की यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है, सम्राट चन्द्र गुप्तविक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं) द्वारा स्थापित किया गया था और यह लौह स्तम्भ
आज भी विज्ञानं के लिए आश्चर्य की बात है कि आजतक इसमें जंग नहीं लगा।

उसी महानसम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट,खगोल शास्त्री एवं भवननिर्माण विशेषज्ञ वराह मिहिर, वैद्य राज ब्रम्हगुप्तआदि हुए. ऐसे राजा के राज्य काल को जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ तो क्या जंगल में अकेला स्तम्भबना होगा निश्चय ही आसपास अन्य निर्माण हुए होंगेजिसमे एक भगवन विष्णु का मंदिर था उसी मंदिर केपार्श्व में विशालस्तम्भ वि ष्णुध्वज जिसमे सत्ताईसझरोखे जो सत्ताईस नक्षत्रो व खगोलीय अध्ययन केलिए बनाए गए निश्चय ही वराह मिहिर के निर्देशन मेंबनाये गए. इस प्रकार कुतब मीनार के निर्माण का श्रेय सम्राटचन्द्र गुप्त विक्रमादित्य के राज्य कल में खगोलशाष्त्री वराहमिहिर को जाता है I कुतुबुद्दीन ने सिर्फ इतना किया कि भगवान विष्णु के मंदिर को विध्वंस किया उसे कुवातुल इस्लाम मस्जिद कह दिया, विष्णु ध्वज (स्तम्भ ) के हिन्दू संकेतों को छुपाकर उन पर अरबी के शब्द लिखा दिए औरबन गया क़ुतुब मीनार!

स्रोत- अखिल भारत हिंदू महासभा


पिछले तीन-चार या शायद उस से भी अधिक महीनों से भैया ने मुझे फोन नहीं किया था. गाहे बगाहे मैं जब फोन करती, भैया से बातें हो नहीं पाती. भाभी अलबत्ता उनकी व्यस्तता का रोना रोती रहतीं. रक्षाबंधन आ रहा था, मुझे बार बार अपनी बचपन वाली 'राखी' याद आ रही थी. कितना बड़ा त्यौहार होता था तब ये| रक्षा बंधन के लिए मम्मी हमदोनों भाई-बहन के लिए नए कपडे खरीदती. बाज़ार में घूम घूम भैया की कलाई के लिए सबसे स्पेशल राखी खरीदना. सुनहरी किरणों से सजी, वो मोटे से स्पंज नुमा फूल पर 'मेरे भैया' लिखा होना| समय के साथ राखी के स्वरुप और डिज़ाइन में आज बहुत फर्क आ गया है. अब तो पहले अधिक सुंदर और डिज़ाइनर राखियाँ बाज़ार में उपलब्ध हैं. पर दिल उस पल के लिए तडपता है जब भाई को सामने बिठा मैं खुद राखी बांधती थी. तिलक लगाती, आरती उतराती और मिठाई खिलाती. मम्मी पूरे साल हम दोनों भाई-बहन को एक सा जेब खर्च देती थी, जिसे हम खर्च ना कर गुल्लक में डाल देतें. पर रक्षा बंधन के बाद मेरे गुल्लक में भैया से अधिक पैसे हो जातें. भैया कभी कभी खीजता हुआ बोलता भी था,
"सिर्फ मैं ही क्यूँ पैसे दूँ, ये भी दे मुझे. पांच रूपये की राखी बांधती है और सौ ले लेती है."
माँ हमें त्यौहार की कहानी बताती और भैया को राखी का महत्व. बहन-भाई के रिश्तें समझाती और भैया को उनकी जिम्मेदारियों के प्रति आगाह करती . माँ कहानी सुनाती रहती और मैं भैया के हाथ से नोट छीन झट अपने गुल्लक के सुपुर्द कर आती. फिर भैया मेरे पीछे दौड़ता और मैं जीभ चिढ़ाती भागने लगती|
यादों का एल्बम बिना छुए पलट चुका था, बचपन के पन्ने फडफडाते हुए यादों की ढेर सारी खट्टी-मीठी गोलियां बिखेर चुका था. हर फ्रेम में मैं और भैया. नन्हे भैया के गोद में मैं, से साथ खेलती तस्वीरों के साथ भैया के सीने से लग रोती बिलखती दुल्हन बनी मैं. ऐसा महसूस हुआ कि हाथ बढ़ा इन पलों को वापस खींच लूँ . अब जो पल वापस आयेंगे तो मैं भैया के हाथ से पैसे नहीं खिंचूँगी, बल्कि उनसे ले वापस उनके पॉकेट में ही धर दूंगी|
माँ के साँझा आँगन से निकल अब हमदोनों की ही अपनी अपनी दुनिया है, अपनी अपनी घर-गृहस्थी और काम. पर उससे हमारा रिश्ता तो नहीं बदल जाता. काम तो मैं भी करती हूँ पर भैया ने मानों व्यस्तता की ढाल बना ली है. जिसकी आड़ में वह रिश्तों के बंधनों से पनाह चाहतें हो जैसे. शायद मेरी सोच गलत होगी, भैया की होगी कोई विवशता पर... पर ....क्या साल में एक दिन भैया मुझे तवज्जो नहीं दे सकतें. क्या माँ की सिखाई बातें अब उसे याद नहीं आती होंगी?
सही सब सोचते सोचते मैंने निर्णय लिया कि इस वर्ष मैं भैया को राखी नहीं भेजूंगी. पिछले वर्ष तो भैया ने पावती की खबर तक नहीं दिया था. राखी के दिन हार कर दोपहर में मैंने फोन किया तो भैया बोले,
"अभी रख मैं एक जरूरी मीटिंग में बैठा हुआ हूँ"
"भैया राखी.....? ", उस जल्दी में भी मैंने पूछ ही लिया|
" वो सब शाम को अब, तू रख मैं फोन करता हूँ"|
शाम को भैया का फोन ना आना था ना आई, मैं सोचती रह गयी कि मेरी राखी उन्होंने बाँधी भी होगी कि नहीं. अब बड़े सीनियर अफसर हैं क्या पता शर्म आती होगी. पर मैंने तो अपने दफ्त्तर में सभी बड़े-छोटे पुरुष कर्मियों को पतली रेशम की तार वाली राखियाँ बांधे हुए देखा था|
जो हो, मुझे इस वर्ष राखी खरीदनी भी नहीं थी किसी को भेजनी भी नहीं थी. यही मेरा निर्णय रहा.
रक्षाबंधन वाले दिन अलबत्ता सुबह उठ, नहा-धो पूजा करने बैठी तो भैया की फिर बहुत याद आ गयी. मुझे लगने लगा कि क्यूँ नहीं मैंने राखी भेजा. जाने भैया किन परेशानियों से दो चार हो रहें होंगे, कम से कम मेरे रक्षा सूत्र उनकी रक्षा तो करतें. मेरी रुलाई छूट गयी. आंसू पोंछ मैंने भैया की लम्बी उम्र के लिए दुआएं मांगी और साथ ही साथ माफ़ी भी.
उस दिन मेरे दफ्तर की छुट्टी थी, सो पति को भेजने के बाद मैं अनमनी सी इधर उधर हो रही थी घर में. जाने क्यूँ एक अनजाना सा इन्तजार बना हुआ था, कि तभी कॉल बेल बजी देखा कूरियर वाला था, भेजने वाले का नाम देखा तो भैया का था. मेरा दिल बल्लियों उछल पड़ा. खोला तो एक बेहद ख़ूबसूरत सी ड्रेस थी बिलकुल वैसी ही जो मैंने पिछले दिनों मॉल में देखा था और काफी उलट-पलट कर नहीं लिया था. इस बीच ये भी घर जल्दी आ गएँ थे पर मैं तो ड्रेस में ही खोयी हुई थी. भैया को फोन लगाती हूँ, अभी सोचा ही था कि भैया का फोन आ गया.
"अरे छुटकी कैसी हो ? तुम्हारा भेजा राखी मुझे बस अभी अभी ही मिला. देख मैंने बाँध कर whatsapp पर फोटो भी भेजा है. अब इतनी मिठाई भेजने की क्या जरूरत थी ? पर सारे मेरे पसंद के हैं. खुश रह बहना, चल, फोन रख , अभी मुझे एक मीटिंग में जाना है .....", बोलते हुए भैया ने फोन काट दिया|
मैं आश्चर्य से हकलाते ही रह गयी, बोल ही नहीं पायी कि मैंने तो इस बार......,
कि अचानक मेरी निगाह अपने पतिदेव की तरफ घूम गयी जो अब एक रहस्यमयी मुस्कान ओढ़े सोफे पर बैठे सुबह की बासी अखबार को पढने का उपक्रम कर रहें थें|
" तुम इतने वर्षों से मेरी दोनों बहनों को मेरे नाम से राखी की सौगातें भेज सकती हो तो मैं तुम्हारी तरफ से अपने साले साहब को राखी नहीं भेज सकता. फिर तुम दोनों के बीच की ये नयी नयी उठ रही दीवार को भी ढहना जरूरी था. भाई भलें बोलें नहीं पर भावनाएं उनमें भी होती ही हैं. चलों अब जल्दी से नयी ड्रेस पहन के भी आओ, रक्षाबंधन के दिन तुम हमेशा नयी ड्रेस पहनती आई हो ना बचपन से"|
पति देव बोल रहें थें और मैं भावनाओं की ज्वर-भाटा में डूब उतरा रही थी
#रीतागुप्ता  

‪#‎अदालत‬ की झंझट से बचने का एक अनुभव आपसे 'शेयर' करना चाहता हूँ....
अब से 19 वर्ष पूर्व हमारी होटल से जुड़ी एक दूकान 2500/- प्रति माह के हिसाब से किराये पर मेरे पिता जी ने उठाई थी। लिखित शर्त थी कि हर तीन वर्ष में 10% किराया बढ़ाया जाएगा। 15 वर्ष में यह किराया बढ़ते-बढ़ते 3660/- मासिक हो गया। मैंने किराएदार से किराया 'रिव्यू' करने का अनुरोध किया क्योंकि उस दूकान का तात्कालीन प्रचलित किराया 30 से 35 हजार रुपए प्रति माह हो चुका था, लगभग दस गुना अधिक !
किराएदार ने उचित तर्क दिया कि अनुबंध के हिसाब से हर तीन वर्ष में किराया बढ़ाया जा रहा है, वही मिलेगा। इस प्रकार उन्होंने 'रिव्यू' करने से इंकार कर दिया। मैंने उनसे दूकान खाली करने का अनुरोध किया, उन्होंने दूकान खाली करने से भी इंकार कर दिया और मुझसे कहा- 'जैसा बन सके, करवा लो।'
दूकान खाली करवाने के जो आजकल तरीके चल रहे हैं, वे मेरे स्वभाव के अनुरूप नहीं थे लेकिन एक तरीका सज्जनता वाला बचा था, अदालत में दूकान खाली करने के लिए मुकदमा दायर करना। मैंने अपने वकील मित्र  शर्मा से चर्चा की तो उन्होंने कहा- 'दूकान खाली हो जाएगी लेकिन समय बहुत लगेगा, लोवर कोर्ट, फिर हाई कोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट....कितना चक्कर काटेंगे ?'
'फिर ?'
'देखो न, बातचीत से काम बनता हो।'
'उन्होंने तो साफ इंकार कर दिया।'
'तो फिर मुकदमा दायर कर दीजिए लेकिन कचहरी आपके जैसे आदमी के लायक जगह नहीं है, मैं आपको वहाँ नहीं देखना चाहता। आप और विचार कर लीजिए।'
'ठीक है।' मैंने कहा और वापस आ गया। उसके बाद मुझे विचार आया कि किराएदार के ऊपर मनोवज्ञानिक दबाव बनाया जाए। मैंने उनसे किराया लेना बंद कर दिया।
बिना किराए लिए दो साल बीत गए। एक शाम वे मेरे पास आए और बोले- 'दुवारका भैया, ये क्या कर रहे हो ? किराया क्यों नहीं लेते हो ?'
'किराया इतना कम है कि लेने का दिल नहीं करता। घर की बात है, आपका व्यापार चल रहा है, मुझे खुशी है।' मैंने कहा।
'ऐसा थोड़े होता है।'
'तो आप किराया बढ़ाने पर विचार करें। रुपए की कीमत घट गई है, प्रापर्टी की कीमत बढ़ गई है, मैं कैसा करूँ ?'
'इतवार को बैठक कर लेते हैं।' उन्होंने कहा।
नियत दिन बैठक हुई, विचार-विमर्श हुआ और वे दस हजार रुपए प्रति माह किराया देने के लिए सहमत हो गए। प्रति वर्ष 10% किराया बढ़ाने और 'एरियर्स' किराया नई निर्धारित दर पर देने के लिए भी सहमत हो गए।
मैं भी खुश, वे भी खुश। हम लोग अदालत के चक्कर काटने से बच गए और हमारा प्रेम-व्यवहार कायम है।
बताइये, यह प्रयोग आपको कैसा लगा ?
#द्वरिका प्रसाद  

विश्व के पहले शल्य चिकित्सक - आचार्य सुश्रुत || शल्य चिकित्सा के जनक: सुश्रुत
सुश्रुत प्राचीन भारत के महान चिकित्साशास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे। उनको शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। 

शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और 'सुश्रुत संहिता' के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है।

(सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। विश्वामित्र से कौन से विश्वामित्र अभिप्रेत हैं, यह स्पष्ट नहीं। सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था। काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। सुश्रुत के सहपाठी औपधेनव, वैतरणी आदि अनेक छात्र थे सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी आता है अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है;।। वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता, इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के सिवाय दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी सुश्रुत के नाम पर आयुर्वेद भी प्रसिद्ध हैं यह सुश्रुत राजर्षि शालिहोत्र के पुत्र कहे जाते हैं (शालिहोत्रेण गर्गेण सुश्रुतेन च भाषितम् - सिद्धोपदेशसंग्रह)।।। सुश्रुत के उत्तरतंत्र को दूसरे का बनाया मानकर कुछ लोग प्रथम भाग को सुश्रुत के नाम से कहते हैं;। जो विचारणीय है वास्तव में सुश्रुत संहिता एक ही व्यक्ति की रचना है)।

सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी। सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ओपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोडऩे में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है। 
इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे। मानव शारीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। इन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी है।

सुश्रुतसंहिता आयुर्वेद के तीन मूलभूत ग्रन्थों में से एक है। आठवीं शताब्दी में इस ग्रन्थ का अरबी भाषा में 'किताब-ए-सुस्रुद' नाम से अनुवाद हुआ था। सुश्रुतसंहिता में 184 अध्याय हैं 1120 रोगों, 700 औषधीय पौधों, खनिज-स्रोतों पर आधारित 64 प्रक्रियाओं, जन्तु-स्रोतों पर आधारित 57 प्रक्रियाओं, तथा आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का उल्लेख है जिनमें।

सुश्रुत संहिता दो खण्डों में विभक्त है: पूर्वतंत्र तथा उत्तरतंत्र

पूर्वतंत्र: पूर्वतंत्र के पाँच भाग हैं- सूत्रस्थान, निदानस्थान, शरीरस्थान, कल्पस्थान तथा चिकित्सास्थान। इसमें 120 अध्याय हैं जिनमें आयुर्वेद के प्रथम चार अंगों (शल्यतंत्र, अगदतंत्र, रसायनतंत्र, वाजीकरण) का विस्तृत विवेचन है। (चरकसंहिता और अष्टांगहृदय ग्रंथों में भी 120 अध्याय ही हैं।)

उत्तरतंत्र: इस तंत्र में 64 अध्याय हैं जिनमें आयुर्वेद के शेष चार अंगों (शालाक्य, कौमार्यभृत्य, कायचिकित्सा तथा भूतविद्या) का विस्तृत विवेचन है। इस तंत्र को 'औपद्रविक' भी कहते हैं क्योंकि इसमें शल्यक्रिया से होने वाले 'उपद्रवों' के साथ ही ज्वर, पेचिस, हिचकी, खांसी, कृमिरोग, पाण्डु (पीलिया), कमला आदि का वर्णन है। उत्तरतंत्र का एक भाग 'शालाक्यतंत्र' है जिसमें आँख, कान, नाक एवं सिर के रोगों का वर्णन है।

सुश्रुतसंहिता में आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का वर्णन है:

(1) छेद्य (छेदन हेतु)
(2) भेद्य (भेदन हेतु)
(3) लेख्य (अलग करने हेतु)
(4) वेध्य (शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए)
(5) ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए)
(6) अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए)
(7) विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए)
(8) सीव्य (घाव सिलने के लिए)

सुश्रुत संहिता में शल्य क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। इस महान ग्रन्थ में 24 प्रकार के स्वास्तिकों, 2 प्रकार के संदसों (), 28 प्रकार की शलाकाओं तथा 20 प्रकार की नाड़ियों (नलिका) का उल्लेख हुआ है। इनके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग की शस्त्र-क्रिया के लिए बीस प्रकार के शस्त्रों (उपकरणों) का भी वर्णन किया गया है। ऊपर जिन आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का संदर्भ आया है, वे विभिन्न साधनों व उपकरणों से की जाती थीं। उपकरणों (शस्त्रों) के नाम इस प्रकार हैं-

1. अर्द्धआधार,
2. अतिमुख,
3. अरा,
4. बदिशा
5. दंत शंकु,
6. एषणी,
7. कर-पत्र,
8. कृतारिका,
9. कुथारिका,
10 कुश-पात्र,
11. मण्डलाग्र,
12. मुद्रिका,
13. नख
14. शस्त्र,
15. शरारिमुख,
16. सूचि,
17. त्रिकुर्चकर,
18. उत्पल पत्र,
19. वृध-पत्र,
20. वृहिमुख
तथा
21. वेतस-पत्र

आज से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व सुश्रुत ने सर्वोत्कृष्ट इस्पात के उपकरण बनाये जाने की आवश्यकता बताई। आचार्य ने इस पर भी बल दिया है कि उपकरण तेज धार वाले हों तथा इतने पैने कि उनसे बाल को भी दो हिस्सों में काटा जा सके। शल्यक्रिया से पहले व बाद में वातावरण व उपकरणों की शुद्धता (रोग-प्रतिरोधी वातावरण) पर सुश्रुत ने विशेष जोर दिया है। शल्य चिकित्सा (सर्जरी) से पहले रोगी को संज्ञा-शून्य करने (एनेस्थेशिया) की विधि व इसकी आवश्यकता भी बताई गई है।

इन उपकरणों के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर बांस, स्फटिक तथा कुछ विशेष प्रकार के प्रस्तर खण्डों का उपयोग भी शल्य क्रिया में किया जाता था। शल्य क्रिया के मर्मज्ञ महर्षि सुश्रुत ने 14 प्रकार की पट्टियों का विवरण किया है। उन्होंने हड्डियों के खिसकने के छह प्रकारों तथा अस्थिभंग के 12 प्रकारों की विवेचना की है। यही नहीं, सुश्रुतसंहिता में कान संबंधी बीमारियों के 28 प्रकार तथा नेत्र-रोगों के 26 प्रकार बताए गए हैं।

सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण उत्पन्न हानिकर तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण है। शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया है। 'न्यूरो-सर्जरी' अर्थात् रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का उल्लेख है तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया 'प्लास्टिक सर्जरी' का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है।

अस्थिभंग, कृत्रिम अंगरोपण, प्लास्टिक सर्जरी, दंतचिकित्सा, नेत्रचिकित्सा, मोतियाबिंद का शस्त्रकर्म, पथरी निकालना, माता का उदर चीरकर बच्चा पैदा करना आदि की विस्तृत विधियाँ सुश्रुतसंहिता में वर्णित हैं।

आप ऊपर चित्र मे देख सकते है की किस प्रकार आचार्य सुश्रुत अपने शिष्यों को शल्यक्रिया का अभ्यास विभिन्न निर्जीव वस्तुओं पर करवाते थे

सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण उत्पन्न हानिकर तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण है।

शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया है।

'न्यूरो-सर्जरी' अर्थात् रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का उल्लेख है तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया 'प्लास्टिक सर्जरी' का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है।

आधुनिकतम विधियों का भी उल्लेख इसमें है। कई विधियां तो ऐसी भी हैं जिनके सम्बंध में आज का चिकित्सा शास्त्र भी अनभिज्ञ है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में शल्य क्रिया अत्यंत उन्नत अवस्था में थी, जबकि शेष विश्व इस विद्या से बिल्कुल अनभिज्ञ था।

रसायन-धातु कर्म विज्ञान के प्रणेता - नागार्जुन। रसायन विज्ञान और सुपर धातुशोधन के जादूगर - नागार्जुन

सनातन कालीन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में रसायन एवं धातु कर्म विज्ञान के सन्दर्भ में नागार्जुन का नाम अमर है ... ये महान गुणों के धनी रसायनविज्ञ इतने प्रतिभाशाली थे की इन्होने विभिन्न धातुओं को सोने (गोल्ड) में बदलने की विधि का वर्णन किया था। एवं इसका सफलतापूर्वक प्रदर्शन भी किया था।

इनकी जन्म तिथि एवं जन्मस्थान के विषय में अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार इनका जन्म द्वितीय शताब्दी में हुआ था। अन्य मतानुसार नागार्जुन का जन्म सन् 9 31 में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था,

रसायन शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है। खनिजों, पौधों, कृषिधान्य आदि के द्वारा विविध वस्तुओं का उत्पादन, विभिन्न धातुओं का निर्माण व परस्पर परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि में आवश्यक औषधियों का निर्माण इसके द्वारा होता है।

नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें 'रस रत्नाकर' और 'रसेन्द्र मंगल' बहुत प्रसिद्ध हैं। रसायनशास्त्री व धातुकर्मी होने के साथ साथ इन्होंने अपनी चिकित्सकीय सूझबूझ से अनेक असाध्य रोगों की औषधियाँ तैयार की। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें 'कक्षपुटतंत्र', 'आरोग्य मंजरी', 'योग सार' और 'योगाष्टक' हैं।

रस रत्नाकर ग्रंथ में मुख्य रस माने गए निम्न रसायनों का उल्लेख किया गया है-

(1) महारस (2) उपरस (3) सामान्यरस (4) रत्न (5) धातु (6) विष (7) क्षार (8) अम्ल (9) लवण (10) भस्म।

इतने है महारस -
(1) अभ्रं (2) वैक्रान्त (3) भाषिक (4) विमला (5) शिलाजतु (6) सास्यक (7) चपला (8) रसक

उपरस: -
(1) गंधक (2) गैरिक (3) काशिस (4) सुवरि (5) लालक (6) मन: शिला (7) अंजन (8) कंकुष्ठ

सामान्य रस-
(1) कोयिला (2) गौरीपाषाण (3) नवसार (4) वराटक (5) अग्निजार (6) लाजवर्त (7) गिरि सिंदूर (8) हिंगुल (9) मुर्दाड श्रंगकम्

इसी प्रकार दस से अधिक विष हैं।

रस रत्नाकर अध्याय 9 में रसशाला यानी प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन भी है। इसमें 32 से अधिक यंत्रों का उपयोग किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं-

(1) दोल यंत्र (2) स्वेदनी यंत्र (3) पाटन यंत्र (4) अधस्पदन यंत्र (5) ढेकी यंत्र (6) बालुक यंत्र (7) तिर्यक् पाटन यंत्र (8) विद्याधर यंत्र (9) धूप यंत्र
(10) कोष्ठि यंत्र (11) कच्छप यंत्र (12) डमरू यंत्र।

रसायन

प्रयोगशाला में नागार्जुन ने पारे पर बहुत प्रयोग किए। विस्तार से उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके औषधीय प्रयोग की विधियां बताई हैं। अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं का मिश्रण तैयार करने, पारा तथा अन्य धातुओं का शोधन करने, महारसों का शोधन तथा विभिन्न धातुओं को स्वर्ण या रजत में परिवर्तित करने की विधि दी है।
पारे के प्रयोग से न केवल धातु परिवर्तन किया जाता था अपितु शरीर को निरोगी बनाने और दीर्घायुष्य के लिए उसका प्रयोग होता था। भारत में पारद आश्रित रसविद्या अपने पूर्ण विकसित रूप में स्त्री-पुरुष प्रतीकवाद से जुड़ी है। पारे को शिव तत्व तथा गन्धक को पार्वती तत्व माना गया और इन दोनों के हिंगुल के साथ जुड़ने पर जो द्रव्य उत्पन्न हुआ, उसे रससिन्दूर कहा गया, जो आयुष्य-वर्धक सार के रूप में माना गया।
पारे की रूपान्तरण प्रक्रिया-इन ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि रस-शास्त्री धातुओं और खनिजों के हानिकारक गुणों को दूर कर, उनका आन्तरिक उपयोग करने हेतु तथा उन्हें पूर्णत: योग्य बनाने हेतु विविध शुद्धिकरण की प्रक्रियाएं करते थे। उसमें पारे को अठारह संस्कार यानी शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। इन प्रक्रियाओं में औषधि गुणयुक्त वनस्पतियों के रस और काषाय के साथ पारे का घर्षण करना और गन्धक, अभ्रक तथा कुछ क्षार पदार्थों के साथ पारे का संयोजन करना प्रमुख है। रसवादी यह मानते हैं कि क्रमश: सत्रह शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद पारे में रूपान्तरण (स्वर्ण या रजत के रूप में) की सभी शक्तियों का परीक्षण करना चाहिए। यदि परीक्षण में ठीक निकले तो उसको अठारहवीं शुद्धिकरण की प्रक्रिया में लगाना चाहिए। इसके द्वारा पारे में कायाकल्प की योग्यता आ जाती है।

नागार्जुन कहते हैं-
क्रमेण कृत्वाम्बुधरेण रंजित :.
करोति शुल्वं त्रिपुटेन काञ्चनम्।
सुवर्ण रजतं ताम्रं तीक्ष्णवंग भुजङ्गमा :.
लोहकं षडि्वधं तच्च यथापूर्व तदक्षयम्। - (रसरत्नाकार-3-7-89 -10)

अर्थात् - धातुओं के अक्षय रहने का क्रम निम्न प्रकार से है- सुवर्ण, चांदी, ताम्र, वंग, सीसा, तथा लोहा। इसमें सोना सबसे ज्यादा अक्षय है।

नागार्जुन के रस रत्नाकर में अयस्क सिनाबार से पारद को प्राप्त करने की आसवन (डिस्टीलेशन) विधि, रजत के धातुकर्म का वर्णन तथा वनस्पतियों से कई प्रकार के अम्ल और क्षार की प्राप्ति की भी विधियां वर्णित हैं।

इसके अतिरिक्त रसरत्नाकर में रस (पारे के योगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं। इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं।

पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस से तेजाब (एसिड) बनाने का वर्णन है।

नागार्जुन ने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में उत्तर तन्त्र नामक पुस्तक भी लिखी। इसमें दवाइयां बनाने के तरीके दिये गये हैं। आयुर्वेद की एक पुस्तक `आरोग्यमजरी 'भी लिखी।

महर्षि पाणिनि - महर्षि पाणिनी महर्षि पाणिनि के प्राचीन प्रोग्रामिंग बारे में बताने पूर्व में आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग किस प्रकार कार्य करती है इसके बारे में कुछ बताना चाहूँगी  आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाएँ जैसे सी, सी ++, जावा आदि में प्रोग्रामिंग हाई लेवल लैंग्वेज (उच्च स्तर की भाषा) में लिखे जाते है जो अंग्रेजी के सामान ही होती है | इसे कंप्यूटर की गणना सम्बन्धी व्याख्या (संगणना के सिद्धांत) जिसमे प्रोग्रामिंग के सिंटेक्स आदि का वर्णन होता है, के द्वारा लो लेवल लैंग्वेज (कम स्तर की भाषा) जो विशेष प्रकार का कोड होता है जिसे न्यूमोनिक कहा जाता है जैसे जोड़ के लिए ADD, गुना के लिए एमयूएल आदि में परिवर्तित किये जाते है | तथा इस प्रकार प्राप्त कोड को प्रोसेसर द्वारा द्विआधारी भाषा (बाइनरी भाषा: 0101) में परिवर्तित कर क्रियान्वित किया जाता है |
संगणना पर की इस प्रकार पूरा कंप्यूटर जगत थ्योरी निर्भर करता है | इसी संगणना पर महर्षि पाणिनि (लगभग 500 ई पू) ने एक पूरा ग्रन्थ लिखा था महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े व्याकरण विज्ञानी थे | इनका जन्म उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। कई इतिहासकार इन्हें महर्षि पिंगल का बड़ा भाई मानते है | इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है।
अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनके द्वारा भाषा के सन्दर्भ में किये गये महत्त्व पूर्ण कार्य 19 वी सदी में प्रकाश में आने लगे |
19 वी सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी फ्रांज Bopp (14 सितम्बर 1791-23 अक्टूबर 1867) ने श्री पाणिनि के कार्यो पर गौर फ़रमाया। उन्हें पाणिनि के लिखे हुए ग्रंथों में तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के नए मार्ग मिले | इसके बाद कई संस्कृत के विदेशी चहेतों ने उनके कार्यो में रूचि दिखाई और गहन अध्ययन किया जैसे: Ferdinand डी सौसर (1857-1913), लियोनार्ड ब्लूमफील्ड (1887 - 1949) तथा एक हाल ही के भाषा विज्ञानी Frits Staal (1930-2012)। तथा इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए 19 वी  सदी के एक जर्मन विज्ञानी फ्रेडरिक लुडविग Gottlob Frege (8 नवम्बर 1848-26 जुलाई 1925) ने इस क्षेत्र में कई कार्य किये और इन्हें आधुनिक जगत का प्रथम लॉजिक विज्ञानी कहा जाने लगा | जबकि इनके जन्म से लगभग 2400 वर्ष पूर्व ही श्री पाणिनि इन सब पर एक पूरा ग्रन्थ लिख चुके थे अपनी ग्रामर की रचना के दौरान पाणिनि ने सहायक चिह्न (सहायक प्रतीक) प्रयोग में लिए जिसकी सहायता से कई प्रत्ययों का निर्माण किया और फलस्वरूप ये ग्रामर को और सुद्रढ़ बनाने में सहायक हुए |
इसी तकनीक का प्रयोग आधुनिक विज्ञानी एमिल पोस्ट (फरवरी 11, 1897 - अप्रैल 21, 1954) ने किया और आज की समस्त कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं की नीव रखी | आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका ने पाणिनि के नाम पर एक प्रोग्रामिंग भाषा का निर्माण भी किया है जिसका नाम ही पाणिनि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज रखा है। एक शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (1823-19 00) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा - "मैं निर्भीकतापूर्वक कह ​​सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2। 50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।

अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा
प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके। " अप्रैल 1993 में MLBD समाचार पत्र (indological ग्रंथ सूची की एक मासिक), hardwear घोषित किया है बिना में महर्षि पाणिनि को पहले softwear आदमी। जिसमे बताया गया "जिसका मुख्य शीर्षक था" भविष्य हार्डवेयर के लिए संस्कृत सॉफ्टवेयर "प्राकृतिक भाषाओं (प्राकृतिक भाषा केवल संस्कृत ही है बाकि सब की सब मानव रचित है) को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, पर आज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है। व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं। नासा के वैज्ञानिक Mr.Rick ब्रिग्स ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick ब्रिग्स। द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी।उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी
तथा इन्होने महादेव की कई स्तुतियों की भी रचना की। नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्। -माहेश्वर सूत्र पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार: "पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है" (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी शेरवात्सकी।)। "पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं" (कोल ब्रुक)। "संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है ... यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है" (सर डब्ल्यू। डब्ल्यू। हण्डर)। "पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा"। (प्रो। मोनियर विलियम्स) ये है भारतीय सनातन संस्कृति की महानता एवं वैज्ञानिकता ....... प्रसारण करना ना भूलें यथासंभव शेयर का विनम्र आग्रह।


हम सभी भगवान् शिव और पार्वती के दो पुत्र कार्तिक और गणेश की ही कथा सुनते आये हैं। 
लेकिन शिव और पार्वती के विवाह और उनसे होने वाले पुत्र के पीछे भी रोचक कहानी हैं। 
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान् विष्णु का विवाह ब्रह्म देव के पुत्र भृगु की पुत्री लक्ष्मी से हुआ था. वहीँ ब्रह्मा के दुसरे पुत्र दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान् शिव से हुआ था. लेकिन सती ने आग में कूद कर स्वयं को भस्म कर लिया था। 
तो सवाल ये है कि शिव के पुत्र कैसे हुए?
सती की मृत्यु के बाद सती ने अपना दूसरा जन्म पर्वतराज हिमालय के यहाँ उमा के रूप में लिया था, जिससे भगवान शिव का विवाह हुआ और हिमालय की पुत्री उमा ही ‘पार्वती’ के नाम से जानी गयी. शिव पार्वती के विवाह के बाद उनका गृहस्थ जीवन शुरू हुआ और उन्हें पुत्र प्राप्त हुए। 
1. गणेश-
भगवान् गणेश के जन्म के पीछे की एक कहानी तो हम सब ने सुनी हैं कि माता पार्वती ने अपने उपटन और चन्दन के मिश्रण से गणेश की उत्पत्ति की और उसके बाद स्नान करने गयी थी।  माता पार्वती ने गणेश को यह आदेश दिया था, कि स्नान करते तक वह किसी को घर में प्रवेश न करने दे. कुछ देर में भगवान् शिव आये जिन्हें गणेश ने घर के भीतर जाने से रोक दिया. इस बात से क्रोधित भगवान शिव ने गणेश का सर धढ़ से अलग कर दिया. अपने पुत्र की मृत्य से पार्वती बहुत नाराज़ हुई. माता पार्वती के गुस्से को शांत करने के लिए भगवान् शिव ने कटे सर की जगह हाथी के बच्चे का सर लगा कर गणेश को पुनःजीवित किया। 
2. कार्तिक-
स्कन्द पुराण की रचना कार्तिक के चरित्र पर किया गयी थी।  कहते हैं कि सती की मृत्यु के बाद भगवान् शिव दुखी हो कर लम्बी तपस्या में बैठ गए थे, जिससे विश्व में दैत्यों का आतंक पूरी दुनिया में बढ़ गया था।  सभी देवता इससे परेशान हो कर भगवान् ब्रह्मा के पास उपाय मांगने गए उसी वक़्त ब्रह्म देव ने कहा था कि शिव और पार्वती से जन्मा पुत्र इस समस्या का समाधान करेगा और शिव पार्वती के विवाह के बाद कार्तिक का जन्म हुआ था। 
3. सुकेश-
यह शिव पार्वती का तीसरा पुत्र था।  लेकिन असल में सुकेश शिव पार्वती का नहीं विदुय्त्केश और सालकंठकटा का पुत्र था जिसे दोनों ने लावारिश छोड़ दिया था।  हेती-प्रहेति नाम के दो राक्षस राज हुए थे, उसमे से हेती का पुत्र विदुय्तकेश था. भगवान् शिव और पार्वती जब इस बालक को ऐसे असुरक्षित पाया तो अपने साथ ले आये और उस बालक का पालन पोषण किया था। 
4. जलंधर-
जलंधर भगवान् शिव से निकला चौथा पुत्र था।  कहते हैं कि भगवान शिव ने अपना तेज़ समुद्र में फेक दिया था जिससे जलंधर का जन्म हुआ था। उसमे भगवान शिव के समान ही शक्ति थी और अपनी पत्नी वृंदा के पतिव्रता धर्म के कारण वह इतना शक्तिशाली हो गया था कि उसने इंद्र को भी हरा कर तीनों लोकों में अपना कब्ज़ा जमा लिया था।  तीन लोक के बाद उसने विष्णु को हरा कर बैकुंठ धाम पर भी अपना अधिकार चाहता था पर लक्ष्मी जी को अपनी बहन स्वीकारने के बाद वह बैकुंठ धाम से कैलाश को जीतने चला गया था।  भगवान् शिव और जलंधर के बीच हुए युद्ध में जब उस पर किसी तरह के वार का असर नहीं हो रहा था तब भगवान विष्णु ने जलंधर की पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म तोड़ कर उसकी मृत्यु सुनिश्चित की थी। 
5. अयप्पा-
अयप्पा भगवान् शिव और मोहिनी का रूप धारण किये भगवान विष्णु का पुत्र था।  कहते हैं कि जब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था तो उनकी मादकता से भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था और उस वीर्य से इस बालक का जन्म हुआ. दक्षिण भारत में अयप्पा देव की पूजा अधिक की जाती हैं. अयप्पा देव को ‘हरीहर पुत्र’ के नाम से भी जाना जाता हैं। 
6. भूमा-
कहते हैं कि भगवान् एक बार जब तपस्या कर रहे थे तब उनके शरीर से पसीने की बुँदे धरती पर गिरी थी।  इन बूदों से पृथ्वी ने एक चार भुजाओं वाले बालक को जन्म दिया था. जो भूमा के नाम से जाना गया. बाद में यही भूमा मंगल लोक के देवता के नाम सी भी जाना गया। 
भगवान् शिव के इन 6 पुत्रों के अलावा कई पुत्र हुए, पर सबसे अधिक कथाएँ इन्ही पुत्रों को लेकर बनी और प्रचलित हुई।



बुन्देलखण्ड में कुँवारी लड़कियों द्वारा खेला जाने वाला सुआटा अब लुप्त होता जा रहा हैं.टेसू या सुआटा की प्रतिमा या चित्र बनाकर सूर्योदय से पूर्व रंगोली बनाकर नवरात्रि की अष्टमी तक गीत गाते हुए कुवांरी लड़कियां सुआटा खेलती हैं।बालिकाएँ झाँझी, मिट्टी की छेददार हाँडी- जिसमें दिया जलता रहता है, लेकर एक घर से दूसरे घर फेरा करती हैं, झाँझी के गीत गाती हैं और पैसे माँगती हैं। ये गीत कथा की दृष्टि से अद्भुत, किन्तु मनोरंजक होते हैं। क्वार के महीने में शारदीय नवरात्र के अवसर पर लड़के टेसू के गीत गाते हैं और लड़कियाँ झाँझी के गीत गाती हैं।
मुझे लगता है, दसवीं शताब्दी से शुरू हुआ सुआटा उस समय उठल पथल और बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा वलात कन्याओं के अपरहण के डर से शुरू हुआ।
जिसमें सुआटा (आक्रमणकारियों) की आराधना है, साथ ही सुआटा को खत्म करने वाली देवी (हिमानचलजू की कुँवर) की आराधना भी हैं।
अष्टमी की रात्रि झिंझरी (छेदवाला मटका जिसमें जलते दिये की रोशनी फेलती हैं) लेकर घर - घर रोशनी फैलाने की चेष्टा करते हुए गाती हैं।
"पूँछत-पूँछत आये हैं नारे सुआटा,
कौन बड़े जू की पौर सुआ "
घर से जब गृहणी निकलती है, तो सब मिल कर गाती हैं,
"'नौनी सलौनी भौजी,
कंत तुम्हारे भौजी,
वीरन हमारे भौजी,
झिल-मिल झिल-मिल आरती। "'
--महादेवी पार्वती
अर्थात हे सुन्दर भाभी जो तुम्हारे पति हैं वे हमारे भाई हैं आपकी जोड़ी आरती की तरह झिल-मिल कर रही हैं और तुम लोग शंकर पार्वती से हो ग्रहणी खुश होकर इन्हें कुछ दान देती हैं.फिर यह टोली अगले घर बढ़ जाती हैं | समाज में सामूहिकता और प्रेम लाने का यह लड़कियों का प्रयास होता था ताकि संगठित समाज उन्हें सुरक्षा दे सके।

बचपन के स्मरण से नौरता का भूला सा गीत .....
चिंटी चिंटी कुर्रू दै
बापै भैया लातुर दै
गुजरात के रे बानियां
बम्मन बम्मन जात के
जनेऊ पैरें धात के
टींका दयें रोरी कौ
हार चड़ाबें गौरी खों
आदि आदि। ...
यह क्रम या शुद्धता की दृष्टि से सकता है गलत भी हो।
बचपन के झरोखे से जो है!
 टेसू का सम्बन्ध महाभारत के मिथक जरासंघ से है, जिसकी मृत्यु के बाद क़ैद में रही राजकुमारियों को श्रीकृष्ण जैसा पति मिलता है ...... सम्भबत: ऐसे ही वर की कामना लेकर कुमारी कन्यायें इसका पूजन करती है
 न्योता गीत-
बाबुल जी कुँअर लड़ा यति नारे सुआ हो
गीता बेटी कमला बेटी नेरा तो अनाय
नेरा तो अन्नईयो बेटी नों दिना
दस रय खों दशहरा भैया जीतियो
सूरज भैया के घोड़ला छुटे
चंदा भैया घोड़ला छुटे
कमलेश भैया घोड़ला छूटे।

सामूहिक एकत्र से कुँवारी कन्यायें खेल वाले स्थान पर इकट्ठी होकर एक छोटी-सी पिकनिक की तरह खाती हैं ठिलठिलाती है, हंसती है और गाँव भर का नाम लेकर उसे संतान देने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए नारा बुलंद करती मैं हैं--
"फलाने की वहु को पेट पिराने,
भांस्कू-भासंकू
यह परम्परा तेजी से ख़त्म होने के कगार पर है।
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