भुल्ल्कड़.....हास्य कविता

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भुल्ल्कड़~~ प्रितेश पाठक "यावर"

मेरे साथ ये मुसीबत हैं,
मुझे भूलने की आदत हैं|

एक दिन...
नहाकर निकला, बड़े मूड में गुनगुना रहा था,
अखबार उठाया और वो गाना भूल गया|

फिर एक दिन...
दूध वाले को पैसे देने थे, कही भूल न जाऊ सोचकर,
५०० का नोट जेब से निकाला, कही रखकर भूल गया|

कुछ दिन बाद...
एक शाम "मोपासा" पढ़ने का मन किया, चाय बनाकर छत पर ले गया,
कहानी पढते पढते पहली चुस्की ली, पता चला शक्कर भूल गया|

फीकी चाय की चुस्की में,
ज़ायके की तो बात न रही,
पर उस शाम गाना याद आया,
"दिल ढूंडता हैं फिर वही..."
"मोपासा" की कहानी में भी,
फिर दिलचस्प एक मोड आया,
मैंने व्याकुल होकर पन्ना पलटा,
तो ५०० का एक नोट आया,
अफ़सोस फीकी चाय का भी,
तब जताना फ़िज़ूल गया,
एक चुस्की जब मीठी लगी, तो याद आया,
शक्कर डाली तो थी, पर हिलाना भूल गया|

कहता हू न...
मेरे साथ ये मुसीबत हैं,
मुझे भूलने की आदत हैं|                
http://www.tahriir.com/ से साभार
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