कैलाश मानसरोवर यात्रा

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श्री कैलाश मानसरोवर यात्रा -

    















कैलाश मानसरोवर को शिव पार्वतीजीका घर माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर शिव-शंभू का धाम है। यही वह पावन जगह है, जहाँ शिव-शंभू विराजते हैं। पुराणों के अनुसार यहाँ शिवजी का स्थायी निवास होने के कारण इस स्थान को 12 ज्येतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश बर्फ़ से आच्छादित 22,028 फुट ऊँचे शिखर और उससे लगे
मानसरोवर को 'कैलाश मानसरोवर तीर्थ' कहते है और इस प्रदेश को मानस खंड कहते हैं। हर साल कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करने, शिव-शंभू की आराधना करने, हज़ारों साधु-संत, श्रद्धालु, दार्शनिक यहाँ एकत्रित होते हैं, जिससे इस स्थान की पवित्रता और महत्ता काफ़ी बढ़ जाती है। कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को 'भारतीय दर्शन के हृदय' की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है।
                                   



वर्ष 2013 की यात्रा 12 जून, 2013 से प्रारंभ -
विदेश मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने आज कैलाश मानसरोवर यात्रा- 2013 के लिए यात्रियों के चयन हेतु कंप्यूटरीकृत ड्रा की अध्यक्षता की। वर्ष 2013 की यात्रा 12 जून, 2013 से प्रारंभ होनी है। इस वर्ष 12 जून और 09 सितम्बर के बीच 18 समूहों में 1080 यात्री इस यात्रा पर जाएंगे। प्रत्येक समूह 26 दिन में यात्रा पूरी करेगा।
यह यात्रा उत्तराखंड राज्य से गुजरेगी और लिपूलेख दर्रे से होते हुए तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में प्रवेश करेगी। अपनी यात्रा के दौरान यात्री, पर्यटन और धार्मिक महत्व के अनेक स्थलों से गुजरेंगे।

भारत सरकार एक द्विपक्षीय समझौते के अंतर्गत चीन जनवादी गणराज्य की सरकार के प्रगाढ़ सहयोग से वर्ष 1981 से इस यात्रा का संचालन करती रही है।

कंप्यूटरीकृत ड्रा समारोह के पश्चात मीडिया को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यह यात्रा भारत और चीन के बीच सहयोग का प्रतीक है और जन-जन संपर्क को प्रगाढ़ बनाने में योगदान देती है।

भारत सरकार द्वारा चिकित्सा सहायता, सुरक्षा और भारतीय पक्ष में लिपुलेख दर्रे तक सुरक्षा कवर सहित अनेक सुविधाएं यात्रियों को प्रदान की जाती हैं। पूरी यात्रा के दौरान आपात स्थिति में प्रयोग के लिए यात्रियों के प्रत्येक समूह को एक सैटेलाइट फोन प्रदान किया जाता है। यात्रियों के प्रत्येक समूह के साथ सरकार द्वारा एक संपर्क अधिकारी तैनात किया जाता है जो उनके सामान्य कल्याण के लिए जिम्मेदार होता है।


भारत सीमा में यात्रा - 14 दिन
(127 कि.मी. पैदल, 1306 कि.मी. बस से, कुल 1433 कि.मी.)
चीन सीमा में यात्रा 12 दिन
(53 कि.मी. पैदल, 411कि.मी. बस से, कुल 464 कि.मी.)
संपूर्ण यात्रा 26 दिन
(180 कि.मी. पैदल, 1717 कि.मी. बस से, कुल 1897कि.मी.)





                             


भारत से कैलास-मानसरोवर की यात्रा का मार्ग --


हल्द्वानी-- 'कौसानी --- ' बागेश्वर--- ' धारचूला--- ' तवाघाट--- ' पांगू--- ' सिरखा--- ' गाला--- ' माल्पा--- ' बुधि--- ' गुंजी--- 'कालापानी--- ' लिपू लेख दर्रा--- ' तकलाकोट--- ' जैदी--- ' बरखा मैदान--- ' तारचेन--- ' डेराफुक--- 'श्री कैलास

                                             


कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं किंतु उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थान से अस्ककोट, खेल, गर्विअंग, लिपूलेह, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है। यह भाग 544 किमी (338 मील) लंबा है और इसमें अनेक चढ़ाव उतार है। जाते समय सरलकोट तक 70 किमी (44 मील) की चढ़ाई है, उसके आगे 74 किमी (46 मील) उतराई है। मार्ग मे अनेक धर्मशाला और आश्रम है जहाँ यात्रियों को ठहरने की सुविधा प्राप्त है। गर्विअंग में आगे की यात्रा के निमित्त याक, खच्चर, कुली आदि मिलते हैं। तकला कोट तिब्बत स्थित पहला ग्राम है जहाँ प्रति वर्ष ज्येष्ठ से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है। तकलाकोट से तारचेन जाने के मार्ग में मानसरोवर पड़ता है।


कैलाश की परिक्रमा तारचेन से आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है। तकलाकोट से 40 किमी (25 मील) पर मांधाता पर्वत स्थित गुर्लला का दर्रा 4,938 मीटर (16,200 फुट) की ऊँचाई पर है। इसके मध्य में पहले बाइर्ं ओर मानसरोवर और दाइर्ं ओर राक्षस ताल है। उत्तर की ओर दूर तक कैलाश पर्वत के हिमाच्छादित धवल शिखर का रमणीय दृश्य दिखाई पड़ता है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। प्रवाद है कि यहीं भस्मासुर ने तप किया और यहीं वह भस्म भी हुआ था। इसके आगे डोलमाला और देवीखिंड ऊँचे स्थान है, उनकी ऊँचाई 5,630 मीटर (18,471 फुट) है। इसके निकट ही गौरीकुंड है। जो ऊपर से देखने में पन्ने के रंग और आकार की दिखती है | यह कुंड हमेशा बर्फ़ से ढंका रहता है, मगर तीर्थयात्री बर्फ़ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करना नहीं भूलते। साढे सात किलोमीटर परिधि तथा 80 फ़ुट गहराई वाली इसी झील में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी। मार्ग में स्थान स्थान पर तिब्बती लामाओं के मठ हैं। यात्रा में सामान्यत: दो मास लगते हैं और बरसात आरंभ होने से पूर्व ज्येष्ठ मास के अंत तक यात्री अल्मोड़ा लौट आते हैं। इस प्रदेश में एक सुवासित वनस्पति होती है, जिसे 'कैलास धूप' कहते हैं। लोग उसे प्रसाद स्वरूप लाते हैं।

                              

                                                                        ओम् नमः शिवाय










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