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जिस्मे-सदपाक भी आईना दिखाता है मुझे


दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे,


फिर भी उस शख्स में क्या-क्या नजर आता है मुझे।

सारी आवाजों को सन्नाटे निगल जाएंगे,


कब से रह-रह के यही खौफ सताता है मुझे।

ये अलग बात है कि दिन में तुझे रखता है निढाल,


रात की जद से तो सूरज ही बचाता है मुझे।

इक नए कहर के इमकान से बोझल है फजा,


आसमां धुंध में लिपटा नजर आता है मुझे।

तज्किरा इतना हुआ रूह की आलूदगी का,


जिस्मे-सदपाक भी आईना दिखाता है मुझे |

# शहरयार
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