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मां धारी देवी के मंदिर को विस्थापित नहीं किया गया होता तो यह आपदा कभी नहीं आती।

उत्तराखण्ड में आई आपदा रुक जाती, अगर उमा भारती की बात सुन ली गई होती। कम से कम उत्तराखण्ड में बड़े बुजुर्गों के हवाले से सोशल मीडिया पर वहां के नौजवान यही जानकारी प्रेसित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर मौजूद इन लोगों का स्थानीय बुजुर्गों के हवाले से कहना है कि जो हुआ है वह प्रत्यक्ष दैवी आपदा है। दैवी आपदा का मतलब वह नहीं जो सरकार बता रही है। बल्कि दैवी आपदा का मतलब वह जो सरकार वहां कर रही है, उसके कारण ही यह आपदा आई है।

एक पहाड़ी बुजुर्ग का कहना है कि यह प्रत्यक्ष दैवी का प्रकोप है. जो लोग पहाड़ के निवासी है वो ये बात जानते है कि पहाड़ के देवी देवता कितनी जल्दी रुष्ट होते है. जिस दिन ये देवी आपदा आई, मतलब शनिवार की शाम को, उसी दिन शाम को श्रीनगर में "धारी देवी" के मंदिर को विस्थापित किया गया था. लगभग शाम को ६ बजे और केदारनाथ में जो भरी तबाही हुई वो भी लगभग ८ बजे शुरू हुई. मौसम विभाग के अनुसार जहां जून के मानसून में 70 मीमी बारिश का अनुमान होता है परन्तु वहा 300मीमी बारिश हुई, वो भी सिर्फ 30 घंटो में.

स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि "माँ धारी देवी बड़ी प्रत्यक्ष शक्ति है उस क्षेत्र की. वो दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है. वहां के निवासी ये सब जानते है. किन्तु सरकार वहां पर एक बाँध बना रही है जिससे मंदिर को उठाकर कहीं और ले जाने की जरूरत थी. स्थानीय लोग दो गुटों में बंटे हुए थे. एक मंदिर को हटाना चाहता था और एक गुट नहीं. पर सरकार ने मंदिर की मूर्ति को विस्थापित कर ही दिया. जिसका परिणाम अब दुनिया के सामने है.''

धारी देवी मंदिर को वहां से न हटाने के लिए भाजपा नेता उमा भारती ने 4 महीने पहले उत्तराखंड सरकार से मंदिर नहीं हटाने को कहा था. इस संबंध में उमा भारती ने प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखकर मंदिर को विस्थापित न करने की मांग की थी। साधू संतो ने भी धारी देवी के मंदिर को विस्थापित करने से मना किया था लेकिन सरकार ने 4 दिन पहले 16 जून को मंदिर से मूर्ति हटा दी और उत्तराखंड में उसी दिन प्रलय आ गई. पहाड़ के बुजुर्गों का मानना है कि यदि ऐसी स्थिति किसी मस्जिद या मजार को लेकर होती तो सरकार कोई दूसरा रास्ता खोजती. लेकिन धारी देवी की शक्तियों को सरकार ने जानबूझकर समझने की कोशिश नहीं की, जिसका परिणाम सबके सामने है.

धारी देवी मंदिर काली का स्वरूप है जो श्रीमद्भागवत के अनुसार 108 शक्तिपीठों में से एक और उत्तराखंड में मौजूद 26 शक्तिपीठों में शामिल हैं. धारी देवी के बारे में कहा जाता है कि धारी माता की मूर्ति ऐसी ही एक त्रासदी में बहकर यहां आई थी जिसके बाद स्थानीय लोगों ने उनका रुदन सुना। माता की शक्तियों से परिचित होने के बाद स्थानीय लोगों ने श्रीनगर से 15 किलोमीटर दूर कालियासुर में माता धारी देवी का मंदिर स्थापित कर दिया लेकिन आज तक मूर्ति के ऊपर छत नहीं पड़ सकी है. कहते हैं कि कई बार छत बनाने की कोशिश की गई लेकिन हर बार छत बनाने में नाकामयाबी ही हाथ लगी. मूर्ति स्थापित करने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि उनकी मूर्ति को विस्थापित किया गया है.

हालांकि दो दिन पहले खुद उमा भारती भी यही बात बोल चुकी हैं कि जो हुआ वह धारी देवी मंदिर को विस्थापित करने का प्रकोप है. गंगा पर बुलाये गये एक सम्मेलन में बोलते हुए दिल्ली में उमा भारती ने 19 जून को कहा था कि उनको पूर्व विश्वास है कि अगर मां धारी देवी के मंदिर को विस्थापित नहीं किया गया होता तो यह आपदा कभी नहीं आती।




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