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जो मैं नहीं हुँ, वह होने का नाटक मैंनें कभी नहीं किया।

① उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते।


② जब मृत्यु निश्चत है तो सच्चे और ईमानदार उद्देश्य के लिए देह त्याग करना ही बेहतर है।


③ सत्य मेरा ईश्वर है, सनग्र जगत मेरा देश है।


④ मैं कायरता से घृणा करता हुँ।


⑤ संसार में स्वार्थशुन्य सहानुभूति विरल है।


⑥ मैं मन-कर्म-वचन से पवित्र, निस्वार्थ और निश्चल हो सकुं।


⑦ सांसारिक उन्नति के लिए मधूरभाषी होना कितना अच्छा होता है, यह मैं बखुबी जानता हूँ।


⑧ अच्छा काम बिना बाधा के संपन्न नहीं होता।


⑨ अनुभव ही एक मात्र शिक्षक है।


⑩ जो मैं नहीं हुँ, वह होने का नाटक मैंनें कभी नहीं किया। 

By....Swami VivekaNand

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