पशु-पक्षी समाज में स्त्री जाति की प्रधानता और सोसल मीडिया

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    •    अक्सर डिस्कवरी देखती  हूँ तो पाती  हूँ कि पशु-पक्षी समाज में स्त्री जाति की प्रधानता होती है। उन लोगों के यहाँ हमारे तरह पुरुषप्रधान समाज नहीं हुआ करते। वैसे हमारे यहाँ भी "पुरुषप्रधान" तो सिर्फ़ कहने को ही है, वास्तविकता से सामना तो शादी के बाद ही होता है कि प्रधान पुरुष है या स्त्री। परंतु शादी से पहले तो सामान्यतः पुरुष ही प्रधान होता है। अगर नहीं है तो भगवान उस दीन प्राणी की आत्मा शान्त रखे!  :)
  • हाँ , तो मैं पशु-पक्षियों की बात कर रही  थी । उनके समाज में स्त्रियों की प्रधानता का अन्दाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनमें जीवनसाथी का चुनाव भी मादा ही करती है। यही नहीं, मकड़ी की कुछ प्रजातियों में तो मादा समागम के बाद अपने नर साथी को खा भी लेती हैं। क्यों डर गये ना! और नर मादा को रिझाने के लिये ना जाने क्या-क्या किया करते हैं। कोई नर अपने सतरगी पंखों को फ़ैला कर नाच दिखाता है, तो कोई तरह-तरह की आवाजें निकालता है। कोई तरह-तरह के श्रंगार  करता है तो कोई अपने प्रतिद्वंदी को हराता है।

    घड़ियाल मादा को पाने के लिए अपने प्रतिद्वंदी से घमासान युद्ध करता है, जो प्राय: घंटों चलता है। वहीं, हाथी को प्रेमिका से प्रणय की स्वीकृति प्राप्त करने में हफ्तों या महीनों लग जाते हैं। इस अवधि में हाथी हथिनी का साथ कभी नहीं छोड़ता। कभी बढ़िया खाद्य पदार्थ खोजकर उसे देता है, उसके स्नान में सहायक बनता है, तो कभी विश्राम के लिए आरामदेह स्थान खोजने में उसकी मदद करता है। पक्षी भी अपने संगीत, सुंदर पंखों या अपनी योग्यता का प्रदर्शन करके अपनी प्रेयसी से प्रणय की भीख मांगते हैं। जिन पक्षियों को अपने सुंदर पंखों पर गर्व होता है, वे घंटों तक अपने परों को फुला-फुलाकर संवारते हैं। फिर मादा के सामने पहुंचकर नाचते हैं। इसके बाद हाव-भाव, नृत्य और मनुहारों का क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि मादा रीझ नहीं जाती। गाने वाले पक्षी पेड़ की डाल पर बैठकर जोर-जोर से गाते हैं। इन दिनों उनके गले में एक साज और स्वर में एक अजीब मधुरता आ जाती है और वे दिन-रात प्रणय गीत गाते रहते हैं। जिन पक्षियों को गाना नहीं आता है, वे केवल गले से आवाज करते हैं, जोर-जोर से बोलते हैं। कबूतर अपनी प्रियतमा को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए गुटरगूं का राग अलापता हुआ उसके चारों ओर घूम-घूमकर नाचता है और प्रणय याचना करता है। नर पपीहा भी अनेक हाव-भाव से मादा का चित्त हरने की कोशिश करता है। नर पहले मादा के पास आकर इस तरह से बैठ जाता है, मानो प्यार की भीख मांग रहा हो। फिर मधुर स्वर में अपना प्रणय गीत आरंभ करता है। नर बया भी वर्षा काल आरंभ होने पर बहुत ही कलापूर्ण और अपनी प्रेयसी की रुचि के अनुकूल घोंसला बनाता है और जब मादा उसका निरीक्षण करके उसे 'पास' कर देती है, तो समझिए उसने नर का प्रणय प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। नर नीलकंठ मादा को खुश करने के लिए उसके आगे अपने करतब दिखाता हुआ पहले तो ऊपर उड़ जाता है, फिर नीचे की ओर ऐसे गिरता है मानो मर गया हो। पर जमीन पर आने से पहले ही व संभलकर फिर ऊपर उड़ जाता है। इस प्रकार यह मादा को खुश करके जोड़ा बना लेता है।

    अब आप पूछेंगे कि ये सब मैं आपको क्यों बता रही  हूँ, क्यों मैं फेसबुक या गूगल प्लस पर डिस्कवरी छाँट रही  हूँ? ख़ैर, आप पूछिये, उससे पहले मैं ही बताये देती हूँ। दरअसल क्या है कि, अक्सर मैं डिस्कवरी पर ही नहीं फेसबुक और गूगल प्लस  पर भी ऐसे ही "नर" टाईप इन्सान को देखती  हूँ जो बड़े-बड़े पेजेज के पोस्ट्स पर "Add Me - Add Me" या ज्वाइन सर्किल  का राग अलाप कर "मादाओं" को पटाने की कोशिश करते हैं। और माशाअल्लाह! अपने कमेंट को सजाते तो ऐसे हैं कि मानो कोई मोरनी, हिरणी, कुतिया, बन्दरिया इत्यादि हों, जिनको ये आसानी से पटाकर ही दम मारेंगे। इस "प्रणय-भिक्षा" में बस एक "कटोरे" की कमी खलती है मुझे। बाबा जुकेरबर्ग को चाहिये कि इन बेचारे "नरों" को शीघ्र-अतिशीघ्र एक "ऑनलाइन तथा वर्चुअल" कटोरा प्रदान करें।  :)
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