राजा भोज और एक था गंगू तेली और आज ..

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एक था राजा भोज और एक था गंगू तेली। राजा भोज यूं तो राजा ही थे। पर जमाने के चलन के हिसाब से कई बिल्डिंगों पर बहुत लोन ले रखे थे। हर महीने लोन की ईएमआई बढ़ जाया करती थी। खजाना खाली सा हो रहा था।
बड़ा अद्भुत माहौल था। खजाना खाली हो रहा था, पर मंत्रीगण अमीर हो रहे थे। आंकड़े बता रहे थे कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है। पर सच यह था कि प्रति मंत्री आय बढ़ रही थी।किसी की 768 पर्सेंट सालाना, किसी 8787 पर्सेंट सालाना।

समझदार अर्थशास्त्री मंत्रियों को ही देश मान ले रहे थे और डिक्लेयर कर रहे थे कि देश का भारी विकास कर रहा है। रोज-रोज नए घोटाले सामने आ रहे थे। अश्व घोटाला, रथ घोटाला, घृत घोटाला, इन घोटालों में मंत्रीगण दबाकर नोट खा चुके थे या खा रहे थे। अश्व घोटाले में अश्वों की कीमत लेकर खच्चर खरीदे गए थे और बाद में खच्चर देने वाली कंपनी कहने लगी कि सारे जानवर बराबर हैं। घोड़े और खच्चर में भेद कैसा... जानवर-जानवर में कोई भेद नहीं होना चाहिए।
रथ घोटाले में यह हुआ कि रथ कागजों पर आए दिखा दिए गए। रथ विभाग का मंत्री सहयोगी दल का था, इसलिए उस वक्त चेकिंग नहीं हुई। बाद में चेकिंग हुई तो पता चला कि रथ आए ही नहीं हैं, उनके फोटो जरूर आ गए हैं, जिन्हें रथ मानकर पूरा पेमेंट कर दिया गया।
घृत घोटाले में यह हुआ कि गरीबों के लिए प्रावधित घी सारा का सारा तमाम राज्यमंत्री खा गए। उसकी रकम खा गए। तफ्तीश करने पर पता चला कि तमाम राज्यमंत्री कह रहे हैं कि राज्यमंत्रियों से ज्यादा गरीब कोई नहीं होता। पब्लिक उन्हें मंत्री समझती है और मंत्री उन्हें पब्लिक समझता है। धोबी के कुत्ते से ज्यादा गरीब होते हैं राज्यमंत्री, सो उन्हें गरीबों का घी खाने का हक है।
कुल मिलाकर इतना बमचक मचा हुआ था कि तमाम टीवी न्यूज चैनलों को चौबीस घंटों चलाने के लिए आवश्यक चोरी, उठाईगिरी की खबरें मिल जाती थीं। न्यूज चैनल इसे स्वर्णकाल घोषित करते थे। मंत्रियों के भ्रष्टाचार की खबरें तब ही हटतीं, जब मंत्रियों की रंगीनियों की खबरें आया करती थीं। पब्लिक भी ऐसी चालू हो गई थी कि भ्रष्टाचार और रंगीनी के अलावा वो दूसरी खबरें देखने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती थी।
 खैर...ऐसे माहौल में तमाम मसालों से ध्यान हटाने के लिए राजा भोज ने एक कवि सम्मेलन आयोजित करवाया। इसमें देश-विदेश के तमाम कवियों को बुलाया गया। इसमें उन अफसरों को भी बुलाया गया, जो खुद को कवि मानते थे। इसमें ऐसे कारोबारियों को भी बुलाया गया जो खुद को कवि मानते थे। ऐसे कारोबारियों में से एक था - गंगू तेली। गंगू तेली का तेल का बड़ा कारोबार था, बहुत ही बड़ा। पूरी दुनिया में उसकी तेल की मिलें थीं, कुएं थे। गंगू तेली का जलवा यह था कि वह तमाम देशों की सरकारों को उधार तक दिया करता था, क्योंकि तमाम सरकारें मंत्रियों के घोटाले के कारण बर्बाद हो चुकी थीं। पर चूंकि गंगू तेली अपनी तेल कंपनी में खुद अकेला ही भ्रष्टाचार करता था इसलिए भ्रष्टाचार उचित सीमा में ही करता था।

खैर, कवि सम्मेलन में राजा भोज ने अपने श्लोक पढ़े। कवि कालिदास ने अपनी कविताएं पेश कीं। अन्य कवियों ने भी अपनी कविताएं पेश कीं। गंगू तेली ने अपना कलाम पेश किया -

तुम निकली जाती यों, जैसे तेल की धार
तुम बढ़ती जाती, ज्यों तेल के भाव
तेल इधर, उधर तेल
तेल के खेल, खेल का तेल
यह सच है कि उनका तेल निकल गया है
पर वो ये मानने को तैयार नहीं कि तेल उनका निकल गया है...

राजा भोज ने कुछ ऐसी भंगिमा पेश की मानो उन्हें यह कविता समझ में नहीं आई। कालिदास ने भी राजा के मनोइच्छा अनुरूप वही भंगिमा पेश की। पर सारे कविगण 'वाह वाह'... 'वाह वाह' कर उठे - क्या काव्य प्रतिमान, क्या ही उपमाएं हैं, क्या ही शोभा है। तेल में ही जग है और जग में तेल ही है। तेलमय मैं सब जग जानी, कवि चिहुंक उठे। और कह उठे - राजा भोज आपकी काव्य प्रतिभा अब चुक ली है। गंगू तेली के काव्य से हम सब चमत्कृत हैं।
कहावत है ना... कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली अर्थात गंगू तेली की काव्य प्रतिभा का मुकाबला राजा भोज कैसे कर सकते हैं?

राजा भोज यह सुनकर बेहोश हो गए। तदोपरांत गंगू तेली द्वारा प्रायोजित रस-प्रसंग में कवियों ने तरह-तरह की मदिराओं का आनंद लिया और गंगू तेली द्वारा प्रायोजित दुबई टूर पर निकल गए।
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