' आत्म ' की हत्या ही तय करती है मन की शांति

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यात्रा और आत्महत्या से पहले 
तय कर लेना पड़ता है
सारी तैयारी का जायजा
कंही कुछ रह तो नही गया
क्यूंकि नही होता आभास
कि वापस कब लौटेंगे

आत्महत्या दरअसल एक यात्रा है
फक्त फर्क इतना सा है इस यात्रा मे 
कि मालूम नही रहता मुसाफिर को
कंहा जायेगा वो
मगर इतना जानता है
कि वो लौट नही पायेगा कभी

एक अनंत यात्रा से पहले 
एक और यात्रा 
एक लंबी यात्रा से पहले 
एक छोटी यात्रा मन की कर लेना बेहतर है
और जब बटोर ले देह सारा सामान

मन आश्वत हो जाये कि अब कुछ नही बचा
लेने को इस जग से
क्यूंकि सच मर चुका
तो निकल लेना बेहतर होता है यात्रा पर
मन की शांति के लिए...

शायद यात्रा दे पाये शान्ति जलते मन को
और जब आत्म ही नही रहेगी तो
मन अशांत क्यूं रहेगा भला..

' आत्म ' की हत्या ही तय करती है मन की शांति...
ॐ शांति शांति शांति ॐ 
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