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शनि पर तेल चढ़ाने से नहीं होती है पैसों की कमी......

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर के सभी अंगों में अलग-अलग ग्रहों का वास होता है। यानी अलग-अलग अंगों के कारक ग्रह अलग-अलग हैं। शनिदेव त्वचा, दांत, कान, हड्डियां और घुटनों के कारक ग्रह हैं। यदि कुंडली में शनि अशुभ हो तो इन अंगों से संबंधित परेशानियां व्यक्ति को झेलना पड़ती हैं। इन अंगों की विशेष देखभाल के लिए हर शनिवार तेल मालिश की जानी चाहिए। शनि को तेल अर्पित करने का यही अर्थ है कि हम शनि से संबंधित शरीर के अंगों पर भी तेल लगाएं, ताकि इन अंगों को पीड़ाओं से बचाया जा सके। मालिश करने के लिए सरसो के तेल का उपयोग करना श्रेष्ठ रहता है।


हर शनिवार काफी लोग शनि को तेल अर्पित करते हैं। शनि को तेल अर्पित करने वाले अधिकांश लोग इस काम को सिर्फ प्राचीन परंपरा मानते हैं और वे यही सोचते हैं कि ऐसा करने पर शनि की कृपा प्राप्त होती है। इस परंपरा के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व की कई बातें छिपी हुई हैं, जिन्हें काफी कम लोग जानते हैं।

शनि को तेल अर्पित करते समय ध्यान रखें ये बातें
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अक्सर हर शनिवार को बाजार में या हमारे घर के आसपास शनि प्रतिमा को लिए हुए कुछ लोग दिखाई देते हैं। वे किसी बाल्टी में या किसी अन्य बर्तन में शनि प्रतिमा को रखते हैं और लोग उस पर तेल अर्पित करते हैं। प्रतिमा पर तेल अर्पित करते समय इच्छा अनुसार धन का दान भी करना चाहिए। साथ ही, साफ-सफाई और पवित्रता का भी ध्यान रखें।
तेल चढ़ाने से पहले तेल में अपना चेहरा अवश्य देखें। ऐसा करने पर शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है। धन संबंधी कार्यों में आ रही रुकावटें दूर हो जाती हैं और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

शनि पर तेल चढ़ाने से जुड़ी वैज्ञानिक मान्यता
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर के सभी अंगों में अलग-अलग ग्रहों का वास होता है। यानी अलग-अलग अंगों के कारक ग्रह अलग-अलग हैं। शनिदेव त्वचा, दांत, कान, हड्डियां और घुटनों के कारक ग्रह हैं। यदि कुंडली में शनि अशुभ हो तो इन अंगों से संबंधित परेशानियां व्यक्ति को झेलना पड़ती हैं। इन अंगों की विशेष देखभाल के लिए हर शनिवार तेल मालिश की जानी चाहिए।

शनि को तेल अर्पित करने का यही अर्थ है कि हम शनि से संबंधित शरीर के अंगों पर भी तेल लगाएं, ताकि इन अंगों को पीड़ाओं से बचाया जा सके। मालिश करने के लिए सरसो के तेल का उपयोग करना श्रेष्ठ रहता है।

शनि पर तेल चढ़ाने से जुड़ी धार्मिक मान्यता
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इस परंपरा के लिए कई प्रकार की प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में सर्वाधिक प्रचलित कथा का संबंध हनुमानजी से है। शास्त्रों के अनुसार रामायण काल में एक समय शनि को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था। उस काल में हनुमानजी के बल और सामर्थ्य की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। जब शनि को हनुमानजी के संबंध में जानकारी प्राप्त हुई तो शनि बजरंग बली से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। एक शांत स्थान पर हनुमानजी अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे थे, तभी वहां शनिदेव आ गए और उन्होंने बजरंग बली को युद्ध के ललकारा।

युद्ध की ललकार सुनकर हनुमानजी शनिदेव को समझाने का प्रयास किया, लेकिन शनि नहीं माने और युद्ध के लिए आमंत्रित करने लगे। अंत में हनुमानजी भी युद्ध के लिए तैयार हो गए। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हनुमानजी ने शनि को बुरी तरह परास्त कर दिया। युद्ध में हनुमानजी द्वारा किए गए प्रहारों से शनिदेव के पूरे शरीर में भयंकर पीड़ा हो रही थी। इस पीड़ा को दूर करने के लिए हनुमानजी ने शनि को तेल दिया। इस तेल को लगाते ही शनिदेव की समस्त पीड़ा दूर हो गई। तभी से शनिदेव को तेल अर्पित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। शनिदेव पर जो भी व्यक्ति तेल अर्पित करता है, उसके जीवन की समस्त परेशानियां दूर हो जाती हैं और धन अभाव खत्म हो जाता है।

हनुमानजी की कृपा से शनि की पीड़ा शांत हुई थी, इसी वजह से आज भी शनि हनुमानजी के भक्तों पर विशेष कृपा बनाए रखते हैं।

कौन हैं शनिदेव?
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सभी नौ ग्रहों में शनिदेव का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शनि को न्यायाधीश का पद प्राप्त है। इस वजह से शनि ही हमारे कर्मों का शुभ-अशुभ फल प्रदान करते हैं। जिस व्यक्ति के जैसे कर्म होते हैं, ठीक वैसे ही फल शनि प्रदान करते हैं। ज्योतिष के अनुसार शनिदेव मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं। शनि देव को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं में लौहा, तेल, काले-नीले वस्त्र, घोड़े की नाल, काली उड़द, काले रंग का कंबल शामिल है।

कब हुआ शनि का जन्म
शास्त्रों के अनुसार हिन्दी पंचांग के ज्येष्ठ मास में आने वाली अमावस्या की रात में शनिदेव का जन्म हुआ था।

शनिदेव के अन्य नाम

शनि अत्यंत धीमे चलने वाला ग्रह है और इसे सूर्य की परिक्रमा करने के लिए 30 वर्ष लगते हैं। इसलिए शनि को मंद भी कहते हैं। शनै:-शनै: अर्थात धीरे-धीरे चलने के कारण इन्हें शनैश्चराय भी कहते हैं। शनि यमराज के बड़े भाई हैं, इसलिए इन्हें यमाग्रज भी कहा जाता हैं। रविपुत्र, नीलांबर, छायापुत्र, सूर्यपुत्र आदि भी शनि के नाम हैं।

शनि का पारिवारिक परिचय

शास्त्रों के अनुसार शनिदेव को सूर्य का पुत्र माना गया है। इनकी माता का नाम छाया है। सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र होने के कारण इनका रंग काला है। मनु और यमराज शनि के भाई हैं तथा यमुनाजी इनकी बहन हैं। ऐसा माना जाता है शनि का विवाह चित्ररथ (गंधर्व) की कन्या से हुआ था।

नौ ग्रहों से शनि का संबंध

ज्योतिष में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु बताए गए हैं।
- इन ग्रहों में बुध और शुक्र शनि के मित्र ग्रह हैं।
- सूर्य, चंद्र और मंगल, ये तीनों शनि के शत्रु ग्रह माने गए हैं।
- इनके अलावा गुरु से शनि सम भाव रखता है।
- शेष दो ग्रह राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। इन दोनों ग्रहों से भी शनि देव मैत्री भाव ही रखते हैं।

शनि देव का स्वरूप
शनिदेव का शरीर इंद्रनीलमणि के समान है। इनका रंग श्यामवर्ण माना जाता है। शनि के मस्तक पर स्वर्णमुकुट शोभित रहता है एवं वे नीले वस्त्र धारण किए रहते हैं। शनिदेव का वाहन कौआं है। शनि की चार भुजाएं हैं। इनके एक हाथ में धनुष, एक हाथ में बाण, एक हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में वरमुद्रा सुशोभित है। शनिदेव का तेज करोड़ों सूर्य के समान बताया गया हैं।

शनिदेव की प्रकृति

शनिदेव न्याय, श्रम और प्रजा के देवता हैं। यदि किसी व्यक्ति के कर्म पवित्र हैं तो शनि सुखी-समृद्धि जीवन प्रदान करते हैं। किसानों के लिए शनि मददगार होते हैं। गरीब और असहाय लोगों पर शनि की विशेष कृपा रहती है। जो लोग किसी गरीब को परेशान करते हैं, उन्हें शनि के कोप का सामना करना पड़ता है। शनि पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। वायु इनका तत्व है। साथ ही, शनि व्यक्ति के शारीरिक बल को भी प्रभावित करता है।

शनि आराधना का मंत्र

शनि आराधना के लिए कई मंत्र बताए गए हैं, लेकिन सबसे सरल और प्रभावी मंत्र इस प्रकार है- मंत्र: ऊँ शं श्नैश्चराय नम:
इस मंत्र से शनि आराधना करने पर शनि बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। रुके हुए कार्य बनने लगते हैं।

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