कत्था (खदिर, खैर )catechu

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संस्कृत, खदिर। हिन्दी, कत्था। अंग्रेजी, कच ट्री। लैटिन, एकेषिया कटेचु। मराठी, खैर। बंगाली, विट्टखैर। गुजराती, गन्धिलो|  कत्थे का पेड़ भारत में १५०० मीटर की ऊंचाई तक पंजाब, ,उत्तर पश्चिम हिमालय,मध्यभारत,बिहार,महाराष्ट्र,राजस्थान,कोंकण,आसाम,उड़ीसा ,दक्षिण भारत एवं पश्चिम बंगाल में पाया जाता है | इसके पेड़ नदियों के किनारे अधिक होते हैं | कत्थे का पेड़ बबूल के पेड़ की तरह होता है | कत्था की टहनियां पतली व 11 से 12 सीकों के जोड़ों से युक्त होती हैं जिसमें 30 से 50 जोड़ों में छोटे-छोटे पत्ते लगते हैं। जब इसके पेड़ के तने लगभग एक फुट मोटे हो जाते हैं तब इन्हें काटकर छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर भट्टियों में पकाकर काढ़ा बनाया जाता है | फिर इसे चौकोर रूप दिया जाता है जिसे कत्था कहते हैं |
आइये जानते हैं|
 कत्थे के कुछ औषधीय प्रयोग -

 300 मिलीग्राम की मात्रा में कत्थे का चूर्ण मुंह में रखकर चूसने से गला बैठना, आवाज रुकना, गले की खराश, मसूढों का दर्द, छाले आदि दूर होती है। इसका प्रयोग दिन में 5 से 6 बार कुछ दिनों तक नियमित करना चाहिए।
कत्था, हल्दी और मिश्री 1-1 ग्राम की मात्रा में मिलाकर चूसने से खांसी दूर होती है। इसका प्रयोग दिन में 3 बार कुछ दिनों तक करने से खांसी नष्ट होती है।
खैर (कत्था) के पेड़ की छाल चार भाग, बहेडे़ दो भाग और लौंग एक भाग लेकर पीसकर शहद के साथ सेवन करने से खांसी ठीक होती है।
कत्था/खदिर आदि द्रव्यों से निर्मित खदिरादि वटी चूसने से सभी प्रकार के मुखरोगों में लाभ होता है तथा दांतों के दीर्घकाल तक स्थिरता प्रदान करता है |

 कत्थे को सरसों के तेल में घोलकर प्रतिदिन २ से ३ बार मसूड़ों पर मलने से दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं तथा मसूड़ों से खून आनाव मुँह से बदबू आना बंद हो जाता है |

कत्थे के काढ़े को पानी में मिलाकर प्रतिदिन नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है |

यदि घाव में से पस निकल रहा हो तो कत्थे को घाव पर बुरकने से पस निकलना बंद हो जाता है तथा घाव सूखने लगता है |

सफ़ेद कत्था,माजूफल और गेरू को पीसकर फोड़ों पर लगाने से सिर के फोड़े ठीक होते हैं |


सूखी खांसी में लगभग 360 से 720 मिलीग्राम कत्था सुबह-शाम चाटने से लाभ मिलता है। इससे सूखी खांसी भी दूर होती है।
पानी में काम करने से पैरों की उंगुलियों में घाव हो जाता है। ऐसे में घाव को कत्थे के पानी से धोए और इसका सूखा चूर्ण लगाएं। इससे घाव ठीक होता है।
कत्थे के काढे़ को पानी में मिलाकर प्रतिदिन नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
कत्थे के पेड़ की छाल और आंवला मिलाकर काढ़ा बना लें और इस काढ़े में बावची का चूर्ण डालकर पीने से सफेद कुष्ठ का रोग ठीक होता है।
खैर (कत्थ) की जड़, पत्ते, फूल, फल और छाल का काढ़ा बनाकर स्नान, पान, भोजन और लेप करना चाहिएं। इससे सब प्रकार के कुष्ठ खत्म होते हैं।

मलेरिया के बुखार से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सफेद कत्था 10 ग्राम व मत्लसिंदूर 6 ग्राम को मिलाकर पीस लें और इसे नीम के रस में घोटकर उड़द के बराबर की गोलियां बना लें। इसके सेवन बुखार आने से एक घण्टे पहले रोगी को कराने से बुखार नहीं आता है।
यह गोली बच्चे और गर्भवती स्त्रियों को नहीं देनी चाहिए।

हानिकारक : कत्था का अधिक सेवन करने से नपुंसकता आ सकती है।
मात्रा : कत्था का चूर्ण1 से 3 ग्राम और काढ़ा 50 से100 मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
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