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आदमी को मारा आदमी के गुमान ने....

इसी तरह प्रेमियों की जान ली प्रेम ने सुकरात को मारा सत्य ने, ईसा को प्रेम ने, और करूणा ने कृष्ण को गाँधी को मारा गोडसे ने नहीं, गाँधी के उदात्त ने। नदी का शत्रु हुआ उसका प्रवाह, पहाड़ को डसा ऊँचाई ने, और वनों की देह छलनी की काठ ने। इसी तरह इसी तरह आदमी के भीतर आदमी को मारा आदमी के गुमान ने?

हाथी के दुश्मन हो गए हाथी दाँत,
गेंडे के दुश्मन उसी के सींग,
हिरनों का बैरी हुआ उन्हीं का चर्म,

शेरों-बाघों की शत्रु उन्हीं की खाल और अवयव.
विषधर का शत्रु हुआ उसी का विष,
समूर की ज़ान का गाहक हुआ उसी का लोम
,


आदमी को मारा आदमी के गुमान ने
कोयले को मारा अंदर के खान ने

कर्ण को मारा, कर्ण के दान ने
जान को मारा जहान ने... 

इसी तरह
प्रेमियों की जान ली प्रेम ने
सुकरात को मारा सत्य ने,
ईसा को प्रेम ने,
और करूणा ने कृष्ण को
गाँधी को मारा गोडसे ने नहीं,
गाँधी के उदात्त ने। 
नदी का शत्रु हुआ उसका प्रवाह,
पहाड़ को डसा ऊँचाई ने,
और वनों की देह छलनी की काठ ने। 


इसी तरह
इसी तरह
आदमी के भीतर
आदमी को मारा
आदमी के गुमान ने?


तो सुनों, दोस्तों! 
चलो मारे अंदर के काले बलवान को
अंदर पलते झूठे अभिमान को
आत्म प्रशंसा में मग्न महान को
एक अच्छे, सुसंस्कृत, गरिमामय
भारत के निर्मान को



#सुधीर सक्सेना 
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