जाने मुंडन की परंपरा का वैज्ञानिक पहलु

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हिंदू धर्म पद्धतियों में मुंडन संस्कार एक महत्वपूर्ण परंपरा है। बच्चों का मुंडन, किसी रिश्तेदार की मृत्यु के समय मुंडन। आखिर मुंडन कराने से क्या लाभ होता है। क्यों इन्हें संस्कारों में शामिल किया गया है।हिंदू धर्म के अनुसार मानव जीवन 84 लाख योनियों के बाद मिलता है। पिछले सभी जन्मों के ऋणों को उतारने तथा पिछले जन्मों के पाप कर्मों से मुक्ति के उद्देश्य से उसके जन्मकालीन केश काटे जाते हैं।
मुंडन के वक्त कहीं-कहीं शिखा छोड़ने का भी प्रयोजन है, जिसके पीछे मान्यता यह है कि इससे दिमाग की रक्षा होती है। साथ ही, इससे राहु ग्रह की शांति होती है, जिसके फलस्वरूप सिर ठंडा रहता है।
मुंडन से लाभ :
बाल कटवाने से शरीर की अनावश्यक गर्मी निकल जाती है, दिमाग व सिर ठंडा रहता है व बच्चों में दांत निकलते समय होने वाला सिर दर्द व तालु का कांपना बंद हो जाता है। शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन-डी (धूप के रूप) में पड़ने से कोशिकाएं जाग्रत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले केश बेहतर होते हैं। वास्तव में मुंडन संस्कार सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसके लिए इस परंपरा के पीछे छिपे विज्ञान को समझना होगा। 
जन्म से लेकर मृत्यु तक के सोलह संस्कार हमारे हिन्दू धर्म में अनिवार्य माने गए हैं | सोलह संस्कारों में से ही एक है मुंडन वास्तव में मुंडन संस्कार सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है |
वैज्ञानिक महत्व इसके लिए इस परंपरा के पीछे छिपे विज्ञान को समझना होगा | जन्म के बाद बच्चे का मुंडन किया जाता है, इसके पीछे मुख्य कारण है जब बच्च माँ के गर्भ में होता है तो उसके सिर के बालों में बहुत से कीटाणु , बैक्टिरिया और जीवाणु लगे होते हैं जो साधारण तरह से धोने से नहीं निकल सकते | इसके लिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है | इसलिए जन्म के एक साल के भीतर बच्चे का मुंडन कराया जाता है |
कुछ ऐसा ही कारण मृत्यु के समय मुंडन का भी होता है | जब पार्थिव देह को जलाया जाता है तो उसमें से भी कुछ ऐसे ही जीवाणु हमारे शरीर पर चिपक जाते हैं | नदी में स्नान और धूप में बैठने का भी इसीलिए महत्व है | सिर में चिपके इन जीवाणुओं को पूरी तरह निकालने के लिए ही मुंडन कराया जाता है |

ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है | ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते |

हमें तो अत्यंत गर्व है हिंदुत्व के "सूक्ष्म विज्ञान" व आध्यात्म के ज्ञान पर

जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें |



वेणी दान : संगम तट पर महिलाओ का मुंडन

तीर्थराज प्रयाग में सभी स्त्रियां चाहे वह सुहागिन हों या विधवा, उन्हें मुंडन कराने का अधिकार दिया गया है। इस मुंडन को शुभ माना जाता है, इसे कराने के लिए प्रयाग में समय या मुहूर्त का विचार नहीं किया जाता।

सबसे पहले सावित्री ने ब्रह्मा को तीन अंगुलियों के बराबर अपनी वेणी के बाल काट कर दिए। उन्होंने इसे पवित्र जल में समर्पित कर दिया और अपने सौभाग्य का प्रमाण फूल की माला में वेणीमाधव को भेंट कर दी।इस मुंडन का एक रूप वेणी दान है। यह दान आमतौर पर दक्षिण भारत और महाराष्ट्र की महिलाएं करती हैं।वेणी दान के लिए पहले सोलह उपचारों से वेणीमाधव का पूजन करना चाहिए, फिर अंजुली में चोटी रखकर यह मंत्र पढ़ना चाहिए-

नमोवेण्यै नमोवेण्यै नमोवेण्यै नमो नमः।
पातिव्रत्यं सदामहयमदेहि तुम्यं नमोनमः॥

इस मंत्र से वेणी को जल में छोड़ देना चाहिए, फिर पति की इच्छा के अनुसार या तो पूरा मुंडन कराना चाहिए या नहीं कराना चाहिए। शरीर धारियों के सभी पाप उसके बालों में छिपकर रहते हैं, इसलिए उन्हें कटवा देना चाहिए। अन्य पुराणों में सभी बाल काटने की मनाही की गई है, लेकिन प्रयाग में इसकी मनाही नहीं है।
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