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आखिरकार कोई एक विकल्प

"आज फिर छोटका को उसकी बड़की माय मार-मार के धाग दी है, चुन्निया को कल सांझ के बेला से बोखार चढ़ा है छटपटा रही है, जमीन का केवाला भौज के पास है, बोलती है रजिस्ट्री कर दो नै तो अपना दाना-पानी का जुगाड़ अलग करो, भाय को कोय मतलब नै है ऊ तो भड़वा है साला, चुन्निया माय जबतक जिन्दा थी तबतक ठीक था, मुँह जोर थी ना। सकता कहाँ था ई सब। "

आज एक रिक्शा सुबह से पीएचडी के पानी टंकी के पास लगा है, और वो शायद चालक ही है जो लुंगी और डीले-डाले कमीज में चप्पलों के साथ पैर से खेल रहा है। चेहरे की भाव-भंगिमा बता रही है कि आज उसने अन्न का एक दाना भी नहीं छुआ है। शायद झगड़ा कर के आया होगा, जोरु से?
बीड़ी भी शायद आखिरी ही है ये। सुबह से 4-5 पी चुका है। आज कोई भी साथी-संगी नहीं आया है उसके पास उसकी बीड़ी को साझा करने, ना ही आज उसने किसी को टोका भी। रमेशरा एक बार व्यापार मंडल की सवारी लेकर गुजरा तो चिल्लाया कि "क्या कर रहा है हियाँ बैठे, हुआँ तुमरा इतंजार कर रहा है श्याम बाबू, गाँजा पिले हो का? जाओ जल्दी कोर्ट मोरनिंग है।" उसने पूरा अनसुना कर दिया। दो चार मर्तबे इधर उधर देखा तो पाया कि कोई उसकी ओर ताक भी नहीं रहा है। वो फिर मगन है अपने खेल में, तभी बच्चू आया और उसकी सोच रूपी तद्रा को भंग करते हुए झकझोर दिया फिर खींचकर उसे चाय की दुकान पर ले आया। ये उसका पक्का यार है। बच्चू ने पुछा "क्या हुआ है जो? एक भी सवारी नहीं उठा रहे हो आज?"
"आज फिर छोटका को उसकी बड़की माय मार-मार के धाग दी है, चुन्निया को कल सांझ के बेला से बोखार चढ़ा है छटपटा रही है, जमीन का केवाला भौज के पास है, बोलती है रजिस्ट्री कर दो नै तो अपना दाना-पानी का जुगाड़ अलग क
रो, भाय को कोय मतलब नै है ऊ तो भड़वा है साला, चुन्निया माय जबतक जिन्दा थी तबतक ठीक था, मुँह जोर थी ना। सकता कहाँ था ई सब। "

पूरा एक सांस में ही कह गया वो चेहरे को रुआसा करते हुए
तो ये था जो आज उसे इतना चिंता मग्न किये था। फिर बड़े देर तक दोनो चुपचाप बैठे रहे, चाय के पैसे भी बच्चू ने ही चुकाया, आज उसने बहुनी कहाँ की है जो? बच्चू जब उठ कर गया तो वो कुछ देर वहीं बैठा रहा फिर उठा और बड़बड़ाते हुए रिक्शे पर बैठ गया कि "भाड़ में जाये ये जमीन जगह, 10-15 डिस्मिल जमीन का आज झंझट ही खत्म किये देते हैं।" एकाएक उसके चेहरे की भंगिमा में अप्रत्याशित बदलाव आये और निश्चिंतता की रेखाएँ ललाट पर परिलक्षित हो गई।
मेरे भी मन में अब जिज्ञासाओं के लहर उत्पन्न होने लगे। थोड़ी जानकारी इकट्ठी करने की सोच रहा था। ताकि परिस्थितियों से कुछ अनुभव प्राप्त हो सके। भाग्यवश एक पड़ोसी भी जानकारी साझा करने को तैयार हो गया।
चुन्निया माय थीं तो मुँह जोर लेकिन दिल साफ था अभागिनि का, अभागिनि इसलिए कि जिस दिन ब्याह कर आयी थी ठीक चौठारी के दिन सास मर गई और 6 मास के बाद ससुर। लोग कहने लगे कि डायन दोनो बुढ़ा-बुढ़िया को खा गई। और अभागिनि इसलिए भी कि कोख से निकला 10 महिने का एक बच्चा भी तो खा गई थी वो। शायद इसी सब को सहते-सहते मुँह जोर हो गई थी।
उसके मरने के दो बेटी और दो बेटे बच गए हैं। जिसको अब वो अपनी भौज के पास बनकी लगा आया है। गाय-माल को रखना भी भारी पड़ रहा है। रिक्शा का कमाई तो जग जाहिर होती है। जैसे तैसे जोड़ने के बाद अगर दो टाइम पाँच पेट खा भी ले तो जमीन जगह जान का जंजाल है। उस पर से ये विपदाओं का पहाड़। कोई उपाय नहीं है क्या करेगा वो। सारी सवारी छोड़ कर कल रात को डॅाक्टर के पास भर्ती कर दो छोरों को छोड़ आया है। अब किस मुँह से जाएगा क्लिनिक, कंपाउंडर 450 की फीस और 1200 की दवाई फिर खून-पेसाब जाँच का 600 का पर्जा थमा देगा हाथ में। पैसे हैं कहाँ उसके पास। 5 दिन हुए हैं रिक्शे के मरम्मत पे 3200 खर्च किया है जिसमें भी 400 का उधारी ही ... फिर एक रिक्शा वाले को कर्जा भी कौन दे भला और भौज से तो मांगने की सोच भी नहीं रहा वो हालांकि कल भौज को मोटरी में हजार के कुछ नोट बांधते देखा है पर मांगेगा नहीं .... कतई नहीं, ढीठ भी है एक नम्बर का।
1 बज गये हैं। जु्मे की नमाज खत्म होने को है पर वो बिना किसी नमाजियों के सवारी की परवाह किए बिना ही वहाँ से निकल पड़ा। उसके मस्तिष्क में तो कुछ और ही चक्कर चल रहे हैं। आखिरी बार मैंने फिर उसके चेहरे पर पर खिंची निश्चिंतता की रेखाओं को निहारा। शायद उसे कोई उपाय सूझा है। हो सकता है कोई उसे उधार देने वाला याद आ गया हो, या हिम्मत करके वह भौज से ही मांगेगा, या अपनी रिक्शा ही बेच देगा।
इस प्रकार के कईयों सवालों ने मुझ से पूछा। और किसी एक का जवाब मन में टटोलता हुआ मैं अब मुख्य मार्ग पर था।
घर आते ही अपने दैनिक कार्यों को निपटाने में व्यस्त था। रात को सोते वक्त एक बार फिर उसी चेहरे की निश्चिंतता को याद करते हुए मन को शांत कर रहा था कि चलो आखिरकार कोई एक विकल्प तो अवश्य मिल गया होगा उसे।
आज दूसरा दिन है,
अन्य दिनों की भाँति ही सुबह फिर मैं कोचिंग को निकला और पानी टंकी के पास पहुँच कर इधर-उधर देखा तो कोई नजर नहीं आया। मन को थोड़ी संतुष्टि मिली। किन्तु सहसा एक भीड़ के शोर ने ठिठकने को मजबूर किया। पास जाने पर पता लगा कि नहर के कछार पर एक लावारिस लाश मिली है सुबह। सब देखने को दौड़ पड़े। अब मैं सुन्न था। सवालों का एक झोंका फिर मन को अशांत कर गया।
कहीं वही तो नहीं है? ये क्या किया उस अभागे ने? क्यों किया ऐसा उसने? क्या यही उपाय सूझा था उसे? जाने की हिम्मत तो नहीं हुई पर अगले दिन अखबार ने उसकी मौत को स्पष्ट कर दिया। मैं अब तक सुन्न ही पड़ा था ........
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