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"एक पुड़िया जहर" ~~~~~~~~~~

से याद आ रहा है कि उसके जीवन के पहले पहर में जब वह दूसरों के घर मजदूरी करता था। तब उसका लाला मात्र ४ साल का था। यह भी याद आ रहा है कि जब उसके लाला को पीलिया हुआ था तब इलाज के पैसे जुटाने के लिये कैसे वह दर-दर भटका था... बेटे को कंधे पर लादकर अपनी लाचारी बताते हुये रो-रो कर भीख माँगा था! और इलाज के बाद जब बेटे के ठीक होने की खबर सुनी थी तो अपने बरतन बेचकर इसी मंदिर में बताशे का चढावा चढाया था। १०-१२ साल के होने पर उसकी डांट से गुस्से में आ कर वही बेटा जब



अमावस के गहन शाम की धुंधली वेला है, रात से ठीक पूर्व की। बड़ी मुश्किल से कुछ फर्लांग आगे तक ही दृष्टि जा पा रही है। सूर्य कब का डूब चुका है और अंधकार अपनी चादर फैलाने को आतातुर है। आसमान, जिसपर कभी भी कालिमा हावी हो सकती है, बड़ी ही निर्लज्जतापूर्वक निर्वस्त्र है और बेहद झीना-सा पीलापन लिये हुये है। कहीं-कहीं छिट-पुट लालिमा बिखरी हुई है। मानो किसी चित्रकार ने कागज के महीन से पीत-श्याम कैनवास पर कुछ बूँदें रक्त की छींट दी हों! या मानो काली आँखों के हल्के से पीलेपन के बीच कोई अभागा खून के आँसू रो रहा हो! आने वाले इस अंधकार के वशीभूत होकर विराट आसमान का नीलाभ-वर्ण भी उसका साथ छोड़ चुका है। क्षितिज पर यदा-कदा ध्वनिहीन बिजली चमक रही है। वातावरण में एक अजीब सी बेचैन कर देने वाली उमस व्याप्त है। पेड़ों पर इस वक्त नियमित चहचहाने वाले पंछी भी ना जाने किस अनजान भय से आक्रान्त होकर आज मूक हैं। मानो उनका शोर भी वातावरण की उसी शून्यता में समा गया हो! पेड़ भी काफी गुमसुम हैं... काफी स्थिर और अचल... एक-एक रेशा जड़ है आज! काफी दूर से २-४ कुत्तों के रोने की धीमी आवाजें आ रही हैं। बहुत दूर किसी छोटे से झोंपड़े में एक दीया टिमटिमा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो अपने अस्तित्व के लिये हवाओं से युद्ध लड़ रहा हो!
और इस मरघट से वीराने में शान्त बढ़ा चला जा रहा है वह। अकेला... किंकर्तव्यविमूढ़... दिशाहीन सा... जैसे कोई लक्ष्य ही ना हो! कदम बेहिसाब लड़खड़ा रहे हैं पर वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। बायें हाथ के अंगूठे से ललाट पर आई पसीने की बूँदों को परे करता और दायें हाथ से एक लाठी को पकड़ कर अपने अस्थिपंजर काया को घसीटते हुये कच्छप-गति से उस यादृच्छिक से पथ पर निरंतर अग्रसर है। आँखें अश्रुपूरित! हृदय धौंकनी की भांति धाड़-धाड़ कर चल रहे हैं। और धाड़-धाड़ कर गूँज रहे हैं उसके कानों में उसके बेटे और बहू की आवाजें।
- "और कितनी सेवा करायेंगे आप। ३ सालों से जस-के-तस पड़े हुये खाँसते रहते हैं! अब और मुझसे ना हो पायेगा बाबूजी! रोज-रोज का एक ही आदत बना लिया है आपने! वही बिछावन पर ही मल-मूत्र कर देना! मैं कहता हूँ कि एक आवाज दे देंगे तो क्या कहर आ जायेगा! पाँच मिनट रूक नहीं सकते!"
- "सिर्फ सेवा ही करानी हो तो कर भी दें ये, पर यहाँ तो पैसे को दरिया में बहाना पड़ रहा है! ना जाने कितनी उमर ले कर आये हैं! और इनके पीछे पैसे खर्च कर के भी क्या हासिल हो जायेगा? कितना जीयेंगे आपके पिताजी?"
- "सबसे बड़ा रोग तो स्वयं बुढापा है, उसका इलाज कहाँ से होगा! एक माता-पिता होते हैं जो मरने से पहले अपने बच्चों को काफी कुछ दे कर जाते हैं! और एक आप हैं जो मरते-मरते हमारी जो भी जमा-पूँजी है उसे भी चूल्हे में झोंक देंगे!"
- "माँ ही सही थीं जो हंसते-बोलते चली गईं। कम-से-कम उनके मरने पर दुःख तो हुआ था हमें! आज वो भी यदि होतीं, तो हमारा दीवाला ही निकल जाता!"
और भी ना जाने क्या-क्या!
आज वह आखिरी निर्णय कर के बेटे के घर से निकला है... कि वह अब वह उस घर में कदम भी नहीं रखेगा। जा कर किसी रेलगाड़ी में कटकर जान दे देगा पर उस घर में दोबारा नहीं लौटेगा।
उसके मानसपटल पर उसकी यादें, उसका संपूर्ण जीवन-वृतांत एक चित्रपट की भांति परिदर्शित हो रहा है। हृदय में विचारों की भट्ठी तप रही है और विचारों की हर एक लहर उसके अंदर के तूफान को जागृत कर रही हैं। इसी भावावेश में ना जाने कब से चल रहा है वह! धीमे-धीमे चल कर ही काफी दूर निकल आया है। गाँव से डेढ कोस दूर स्थापित दुर्गा मैय्या के ३०० साल पुराने मंदिर से हवा से बजती घंटियों की आवाजें भी आने लगी है।
उसे याद आ रहा है कि उसके जीवन के पहले पहर में जब वह दूसरों के घर मजदूरी करता था। तब उसका लाला मात्र ४ साल का था। यह भी याद आ रहा है कि जब उसके लाला को पीलिया हुआ था तब इलाज के पैसे जुटाने के लिये कैसे वह दर-दर भटका था... बेटे को कंधे पर लादकर अपनी लाचारी बताते हुये रो-रो कर भीख माँगा था! और इलाज के बाद जब बेटे के ठीक होने की खबर सुनी थी तो अपने बरतन बेचकर इसी मंदिर में बताशे का चढावा चढाया था। १०-१२ साल के होने पर उसकी डांट से गुस्से में आ कर वही बेटा जब घर से निकल कर स्टेशन तक भाग आया था तब उसकी क्या हालत हुई थी, यह भी याद है उसे। तब भी इसी मंदिर में आ कर वह दुर्गा मैय्या के चरणों में अपना सिर पटक-पटक कर रोया था और बेटे ना मिलने की स्थिति में यहीं सिर पटक-पटक कर जान दे देने की शपथ ली थी।
उसका मानना है कि इस मंदिर में जिंदा देवता हैं। ताउम्र उसकी काफी मदद की है यहाँ की दुर्गा मैय्या ने। वह अपने बचपन से इस मंदिर के प्रांगण में समय बिताया करता था। बचपन में अपने पिताजी के साथ, युवा होने पर दोस्तों के साथ, जवानी में उसके बेटे लाला के साथ और बुढापे में उसके हमउम्र लोगों के साथ। पर जब से वह लकवाग्रस्त हुआ था, तब से यहाँ नहीं आ पाया था। हलाँकि अपने बेटे से उसने कई बार चिरौरी की थी पर आज तक उसकी मनोकामना पूरी नहीं हुई। आज वह किसी तरह भावावेश में आ कर यहाँ तक आ पहुँचा है। मंदिर के बाहर रखे घड़े से हाथ-पैर-मुँह धोकर वह मंदिर की सीढियों पर बैठ गया है। अब वह शांत है। जैसी मानसिक शांति अब उसे महसूस हो रही है, वैसी जीवन में कभी नहीं हुई थी। ऐसा लग रहा है जैसे वह अपने पूर्वजों के सानिध्य में आ बैठा है। अब उसे कोई कष्ट नहीं है। मुस्कुरा भी रहा है। मानो यहाँ आना ही उसकी आखिरी इच्छा थी।
काफी देर हो चुकी है। घनी काली रात ने अपने आगोश में वातावरण को भर लिया है। मंदिर में एक दीपक जल रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो एक अकेले दीये को अंध-रक्ष चहुँ ओर से घेरने को व्याकुल है पर दीया इस कदर संग्राम कर रहा है कि अंध-रक्ष को अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा देने के बावजूद हारना पड़ रहा है। अपनी आखिरी सांस तक वह दीया अडिग ही रहेगा। हलांकि अब उसका चित्त शांत है पर अंतर्मन में विचार-रूपी द्वंद्व अब भी चल रहे हैं। अचानक वह अपनी लाठी के सहारे उठ खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। उठते-उठते एक बार वह गिर भी पड़ा है। शायद घुटने भी छिल गये हैं। पर यकीनन उसने कोई निर्णय ले लिया है। दुर्गा मैय्या को एक आखिरी प्रणाम कर के वह निकल पड़ा मंदिर से।
पर यह क्या! वह तो पुनः घर की ओर ही जा रहा है। मंदिर के दीये की रोशनी ज्यादा दूर तक नहीं है, ऊपर से बुढापे की आँखें! दो-चार बार मंदिर के बाहर भी गिर पड़ा है। अपनी असमर्थता पर आँसू निकल आये हैं उसके। पर अपनी फटी धोती के कोर से उन आँसूओं को पोंछ कर फिर उठ खड़ा हुआ है वह। पूर्ववत अपने शरीर को लाठी के सहारे घसीटता हुआ वह बूढा अंधेरे की ओर बढ़ चला है। धीमे-धीमे घर की दिशा में बढ़ता हुआ वह मंदिर से काफी दूर निकल आया है। अब तो काफी दूर एक रेखा सी ही दिखाई दे रही है उसकी। पर... यह क्या! वह रेखा तो अचानक गिर पड़ी है। काफी देर हो गयी अब तक, वह रेखा उठती हुई नहीं दिख रही। कहीं वह इस घनघोर अंधकार में अंतःविलीन तो नहीं हो गया! नहीं-नहीं! यह क्या सोच रहा हूँ मैं! कहीं मुझे ही इस घनघोर घुप्प अंधकार की वजह से दृष्टिभ्रम तो नहीं हो रहा! पर मंदिर का दीपक भी तो बुझ चुका है! क्या प्रकाश पर तिमिर हावी हो गया! क्या हुआ? कुछ पता नहीं!
धीरे-धीरे सुबह हो रही है। एक बार फिर प्रकाश अंधकार को चुनौती देने आ गया है। मुर्गे भी बाँग दे रहे हैं। काफी भीड़ भी नजर आ रही है गाँव में।
- "सुनने में आया है कि एक बूढा मर गया पिछली रात।"
- "क्या!!!"
- "हाँ भाई, वही लाला दीनदयाल का बाप... अपाहिज!!! सुनने में आया है कि रात भर से गायब था और सुबह उसकी बहू ने उसकी लाश घर के चौखट से बाहर पड़ी हुई पाया। सुनते हैं कि बुढ्ढे के कुर्ते में एक कागज भी मिला है।"
- "ओह!"
- "हाँ भाई, सिर्फ एक पंक्ति लिखी हुई थी - दवाईयों और इलाज में काफी पैसे खर्च होते हैं, पर एक पुड़िया जहर तो २ रूपये में आता है ना!!!"
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आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन फिरकापरस्तों को करना होगा बेनकाब में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 08 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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